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काशी के कोतवाल 'काल भैरव' के दर पर पहुंचे 'चौकीदार', जानिए क्या है कनेक्शन

Fri, 26 Apr 2019 04:00 PM IST
गौरव शुक्ला फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पीएम मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। - फोटो : Social Media
17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के लिए वाराणसी लोकसभा सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। नामांकन से पहले पीएम मोदी ने काशी के कोतवाल काल भैरव मंदिर में पूजा अर्चना की। पुराणों के मुताबिक, काशी में काल भैरव को स्वयं महादेव ने नियुक्त किया था और काशी में रहने के लिए हर किसी को बाबा भैरव की आज्ञा लेने होती है। काशी में कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले दंड के अधिकारी और कल्याण करने वाले बाबा कालभैरव के दर्शन से मनोकामना तो पूरी होती ही है। उनकी कृपा से हर तरह के कष्ट, दोष व नजर बाधा तक दूर हो जाती है। यह भी मान्यता है कि कालभैरव के दर्शन मात्र से यम के दंड से बचा जा सकता है।
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- फोटो : Social Media
ऐसी मान्यता है कि काल भैरव के दर्शन किए बिना भगवान शिव के दर्शन अधूरे होते हैं। पीएम मोदी जब भी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचते हैं तो वह काल भैरव के लिए एक अनुष्ठान करते हैं। हिंदू धर्म के लोग मोझ नगरी काशी के महत्व को अच्छे से समझता है। काल भैरव के बारे में कहा जाता है कि वह ऐसे देवता है, जिन्हें सब कुछ पसंद है। मिठाई, फल, मेवे, बिस्कुट, टॉफी, भांग, धतूरा भक्तों के द्वारा सच्चे मन से लगाया गया प्रसाद, इन्हें प्रिय है। इनके दर्शन किए बगैर बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।
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- फोटो : goo
बाबा काल भैरव सदियों से काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। वाराणसी की जनता ये मानती है कि प्रभू शहर के रक्षक हैं। शहर में बिना काल भैरव की इजाजत के कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। यह मजाक नहीं सच है कि वाराणसी के कोतावली पुलिस थाने में SHO की कुर्सी पर बाबा काल भैरव बैठते हैं। सालों से यहां ये परंपरा चली आ रही है, जब भी यहां कोई थानेदान की पोस्टिंग होती है, तो वह अपनी कुर्सी पर बाबा काल भैरव को विराजते हैं।

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- फोटो : Social Media
शिवपुराण की कथा में किए गए उल्लेख के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और भगवान विष्णु में बड़ा कौन है इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया। जिस दौरान ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर की निंदा कर दी। भगवान शिव के गुस्से से ही काल भैरव जी प्रकट हुए और उन्होंने नाखूनों से ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था। इसके बाद ब्रह्मा जी चतुर्मुख हो गए थे। इसके बाद काल भैरव के नाखून में ब्रह्मा का खून चिपक गया। भैरव ने खूब कोशिश की, लेकिन खून नहीं छूटा। तब भगवान विष्णु ने काल भैरव को काशी भेजा, यहां पहुंचकर उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिली और उसके बाद वे यहीं स्थापित हो गए। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं।
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बाबा विश्वनाथ काशी के राजा हैं और काल भैरव उनके कोतवाल, जो भक्तों को आशीर्वाद भी देते हैं और सजा भी। यमराज को भी यहां के इंसानों को दंड देने का अधिकार नहीं है। काल भैरव के दर्शन मात्र से लोगों की शनि की साढ़े साती, अढ़ैया और शनि दंड से बचा जा सकता है। 
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kal bhairav temple in varanasi - फोटो : Social Media
भगवान शिव के रुद्र अवतार बाबा कालभैरव का काशी से बहुत गहरा संबंध है, जिस कारण इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि काशी में इन्हें स्वयं महादेव ने नियुक्त किया था। इस मंदिर का शहर के इतिहास और संस्कृति के साथ एक मजबूत संबंध है। काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव भगवान शिव का उग्र रूप है। देवता का चित्रण एक ऐसे इंसान के रूप में किया गया है जिसने मानव खोपड़ी के साथ मालाएं पहन रखी हैं। ऐसा कहा जाता है कि मृत्यु स्वयं भगवान शिव के इस रूप से डरती है। कहा जाता है कि काल भैरव तय करते हैं कि किसे वाराणसी में रहना है और किसे नहीं। वाराणसी के लोग किसी भी कारण से शहर छोड़ने से पहले देवता से अनुमति लेते हैं। वाराणसी जाने वाले किसी भी व्यक्ति को पहले मंदिर जाना चाहिए और लोककथाओं के अनुसार वाराणसी में प्रवेश करने की अनुमति लेनी चाहिए।
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kal bhairav temple - फोटो : Social Media
ये भी कहा जाता है कि भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा हिंदू धर्म के तीन मुख्य देवता हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, एक बार तीनों में से सर्वोच्च कौन है इसको लेकर विवाद हो गया था। सभी वेदों में भगवान शिव को सर्वोच्च शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा दोनों इस निष्कर्ष पर हंसे। शिव क्रोधित हो गए और क्रोध में चले गए जिससे एक भयंकर प्रकाश पैदा हुआ। भगवान विष्णु ने आत्मसमर्पण कर दिया लेकिन भगवान ब्रह्मा प्रकाश को घूरते रहे, जिससे उनका एक सिर जल गया। भगवान शिव द्वारा निर्मित प्रकाश को काल कहा जाता है। काल अपने हाथ में ब्रह्मा का सिर लेकर दुनिया भर में घूमे। जब उन्होंने काशी में प्रवेश किया, तो सिर जमीन पर गिरा और उनके पाप धुल गए। काल वाराणसी में वापस रहता था। मंदिर के निर्माण की सही तारीख ज्ञात नहीं है। साहित्य की मदद से यह 17वीं शताब्दी में माना जाता है।

काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव मंदिर कैसे पहुंचे?

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मंदिर वाराणसी में विशेश्वर गंज में स्थित है। ऑटो, रिक्शा और अन्य लोग आसानी से मंदिर तक पहुंचते हैं। यह काशी विश्वनाथ मंदिर से सिर्फ 10 मिनट की दूरी पर है।
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काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव दर्शन का सबसे अच्छा समय?

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मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक और शाम 4:30 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है। नवंबर में पूर्णिमा के दिन के बाद एक शुभ दिन है और आप मंदिर में कई अनुष्ठान कर सकते हैं। रविवार और मंगलवार को देवता के लिए महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

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