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हैदराबाद के भारत में मिलने की हैरान करने वाली कहानी, हुआ था कुछ ऐसा

Thu, 05 Nov 2020 02:52 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हैदराबाद के भारत में विलय की कहानी - फोटो : Facebook/Shahab Alam
हमेशा से ही 82,698 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैदराबाद रियासत की गिनती भारत के प्रमुख राजघरानों में की जाती थी। इसका क्षेत्रफल ब्रिटेन और स्कॉटलैंड के क्षेत्र से भी अधिक था और आबादी (एक करोड़ 60 लाख) यूरोप के कई देशों से अधिक थी। शायद इसके विशेष दर्जे की वजह से ही उसे आजादी के बाद भारत में शामिल होने या न होने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था। उस समय भारत के गृह सचिव रहे एच वीआर आयंगर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'सरदार पटेल का शुरू से ही मानना था कि भारत के दिल में एक ऐसे क्षेत्र हैदराबाद का होना, जिसकी निष्ठा देश की सीमाओं के बाहर हो। भारत की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा था।'
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जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल - फोटो : Facebook/Dr K Laxman
नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में रखे इस इंटरव्यू में आयंगर यहां तक कहते हैं कि पटेल की दिली इच्छा थी कि निजाम का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। हालांकि नेहरू और माउंटबेटन की वजह से पटेल अपनी इस इच्छा को पूरा नहीं कर पाए। नेहरू पटेल को हमेशा याद दिलाते रहे कि हैदराबाद में बड़ी संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यक रहते हैं। निजाम से पिंड छुड़ाने के बाद होने वाले असर को संभाल पाना भारत के लिए मुश्किल होगा। 

माउंटबेटन को ये खुशफहमी थी कि वो नेहरू की मदद से निजाम को संभाल सकते हैं, लेकिन पटेल ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि 'आपका मुकाबला एक लोमड़ी से है। मुझे निजाम पर कतई विश्वास नहीं है। मेरा मानना है कि आपको निजाम से धोखा ही मिलेगा।' पटेल की नजर में उस समय का हैदराबाद 'भारत के पेट में कैंसर' की तरह था जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था। 
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सरदार पटेल - फोटो : Facebook/Himanshu Rai
सेना भेजने पर पटेल और नेहरू में मतभेद

शुरू में नेहरू हैदराबाद में सेना भेजने के पक्ष में नहीं थे। पटेल के जीवनीकार राजमोहन गांधी लिखते हैं, 'नेहरू का मानना था कि हैदराबाद में सेना भेजने से कश्मीर में भारतीय सैनिक ऑपरेशन को नुकसान पहुंचेगा।' एजी नूरानी अपनी किताब 'द डिसट्रक्शन ऑफ हैदराबाद' में लिखते हैं, 'हैदराबाद के मुद्दे पर कैबिनेट बैठक बुलाई गई थी, जिसमें नेहरू और पटेल दोनों मौजूद थे। नेहरू सैद्धांतिक रूप से सैन्य कार्रवाई के खिलाफ नहीं थे, लेकिन वो इसे अंतिम विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे। वहीं, पटेल के लिए सैनिक कार्रवाई पहला विकल्प था। बातचीत के लिए उनके पास धैर्य नहीं था। नेहरू निजाम की नीतियों के खिलाफ जरूर थे, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उनका उनसे कोई विरोध नहीं था। वो हैदराबाद की संस्कृति के प्रशंसक थे जिसका कि उनकी मित्र सरोजनी नायडू प्रतिनिधित्व करती थीं। लेकिन पटेल को व्यक्तिगत और वैचारिक दोनों तरह से निजाम से नफरत थी।'

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सरदार पटेल - फोटो : Facebook/AIR News
इस बैठक का एक और विवरण पटेल के करीबी और उस समय रिफॉर्म्स कमिश्नर वीपी मेनन ने एच वी हॉडसन को 1964 में दिए गए इंटरव्यू में किया है। मेनन के मुताबिक, 'नेहरू ने बैठक की शुरुआत में ही मुझपर हमला बोला। असल में वो मेरे बहाने सरदार पटेल को निशाना बना रहे थे। पटेल थोड़ी देर तो चुप रहे लेकिन जब नेहरू ज्यादा कटु हो गए तो वो बैठक से वॉक आउट कर गए। मैं भी उनके पीछे-पीछे बाहर आया, क्योंकि मेरे मंत्री की अनुपस्थिति में वहां मेरे रहने का कोई तुक नहीं था। इसके बाद राजा जी ने मुझसे संपर्क करके सरदार को मनाने के लिए कहा। फिर मैं और राजा जी सरदार पटेल के पास गए। वो बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनका ब्लड प्रेशर बहुत हाई था। सरदार गुस्से में चिल्लाए-नेहरू अपनेआप को समझते क्या हैं? आजादी की लड़ाई दूसरे लोगों ने भी लड़ी है।'

सरदार का इरादा था कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुला कर नेहरू को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया जाए, लेकिन राजा जी ने सरदार को डिफेंस कमेटी की बैठक में शामिल होने के लिए मना लिया। इस बैठक में नेहरू शांत रहे और हैदराबाद पर हमला करने की योजना को मंजूरी मिल गई। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : shutterstock.com
दुनिया के सबसे अमीर शख्स-निजाम

कई सदियों से हैदराबाद की हीरे की खानों से दुनिया के एक से एक मशहूर हीरे निकलते आए थे। उनमें से एक कोहिनूर भी था। निजाम के पास दुनिया का सबसे बड़ा 185 कैरेट का जैकब हीरा था, जिसे वो पेपर वेट की तरह इस्तेमाल करते थे। निजाम को 'हिज एक्जाल्टेड हाईनेस' कहा जाता था और वो जहां भी जाते थे उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। टाइम पत्रिका ने 1937 में उन्हें दुनिया का सबसे अमीर शख्स घोषित किया था, लेकिन तब भी वो एक कंगाल की तरह फटी शेरवानी और पाजामा पहनते थे। 
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सरदार पटेल - फोटो : Facebook/Sardar Patel
निजाम के सबसे करीबी थे सैयद कासिम रजवी। उनका अपना राजनीतिक दल था मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन। उन्होंने ही जूनागढ़ विवाद के बाद सरदार पटेल की चुटकी लेते हुए कहा था, 'सरदार से छोटा जूनागढ़ तो संभल नहीं रहा, वो हैदराबाद के बारे में इतना गरज क्यों रहे हैं?'

जब जूनागढ़ ने आत्मसमर्पण कर दिया तो सरदार पटेल ने रजवी को जवाब देते हुए कहा था, 'अगर हैदराबाद ने दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ी तो उसका भी वही हश्र होगा जो जूनागढ़ का हुआ है।' जब निजाम के प्रतिनिधि के तौर पर रजवी सरदार पटेल से मिलने दिल्ली आए तो पटेल ने उनसे स्पष्ट कर दिया कि निजाम के पास सिर्फ दो विकल्प हैं। नंबर 1 भारत में विलय या फिर जनमत संग्रह। उस पर रजवी की टिप्पणी थी कि 'हैदराबाद में जनमत संग्रह तो सिर्फ तलवार के बल पर ही कराया जा सकता है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पाकिस्तान को अपने साथ करने की कोशिश

सत्ता हस्तांतरण के दो दिन बाद यानी 17 अगस्त, 1947 को लंदन में भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन को पता चल गया था कि निजाम और चेकोस्लावाकिया के बीच एक गुप्त सैन्य समझौते की बात चल रही है और हैदराबाद के युद्ध मंत्री अली यावर जंग 30 लाख पाउंड की राइफलों, लाइट मशीन गन, रिवॉल्वरों और दूसरे उपकरणों की खरीदारी करने वाले हैं जिनका इस्तेमाल पुलिस नहीं बल्कि सेना के लिए किया जाएगा। यही नहीं निजाम ने पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये का ऋण देने और कराची में एक व्यापार एजेंट नियुक्त करने की घोषणा भी कर दी। 

पटेल को इस बात का अंदाजा था कि हैदराबाद पूरी तरह से पाकिस्तान के कहने में था। यहां तक कि पाकिस्तान पुर्तगाल के साथ हैदराबाद का समझौता कराने की फिराक में था जिसके तहत हैदराबाद गोवा में बंदरगाह बनवाएगा और जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल कर सकेगा। 

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मुहम्मद अली जिन्ना - फोटो : Facebook/Ali Moeen Nawazish
इंदर मल्होत्रा ने 31 मई को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख 'द हॉरसेज दैट लेड ऑप्रेशन पोलो' में लिखा था, 'निजाम ने राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने की भी इच्छा प्रकट की थी जिसे एटली सरकार ने ठुकरा दिया था। निजाम ने अमेरिकी राष्ट्रपति से भी हस्तक्षेप करने की अपील की थी लेकिन उन्होंने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था।'

11 सितंबर, 1948 को पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना का निधन हो गया। इसके साथ हैदराबाद निजाम का सबसे बड़ा समर्थक इस दुनिया से जाता रहा। 22 मई, 1948 को जब रजाकारों ने गंगापुर स्टेशन पर ट्रेन में सफर कर रहे हिंदुओं पर हमला बोला तो पूरे भारत में सरकार की आलोचना होने लगी कि वो निजाम के प्रति नर्म रुख अपना रही है। 

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फील्डमार्शल के. एम. करियप्पा - फोटो : Social media
भारतीय सेना के पूर्व उपसेना प्रमुख जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा 'स्ट्रेट फ्राम द हार्ट में' लिखते हैं, 'मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं। दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाईअड्डे से सीधे पटेल के घर गए। मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पांच मिनट में बाहर आ गए। बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सीधा सवाल पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आती है तो क्या वो बिना किसी अतिरिक्त मदद के हालात से निपट पाएंगे?'

करियप्पा ने एक शब्द का जवाब दिया, 'हां' और इसके बाद बैठक खत्म हो गई।' इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के खिलाफ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया। उन्होंने दक्षिणी कमान के प्रमुख राजेंद्र सिंह जी जडेजा को बुलावा भेजा और पूछा कि इस कार्रवाई के लिए आपको कितने दिन चाहिए? राजेंद्रजी ने जवाब दिया 'सर, मेरे लिए एक हफ्ता पर्याप्त होगा, लेकिन मानसून के दौरान ये एक्शन नहीं हो सकता। हमें मानसून के गुजर जाने का इंतजार करना होगा।'

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इंडिया गेट (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फैसले के खिलाफ थे। उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई में बम गिरा सकती है, लेकिन पटेल ने उनकी सलाह नहीं मानी। 

इंदर मल्होत्रा अपने लेख में लिखते हैं, 'जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली ने अपनी डिफेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और सवाल किया कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई एक्शन ले सकता है? बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी ने जो बाद में एयर चीफ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने कहा-नहीं।'

लियाकत ने फिर जोर दे कर पूछा क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं? एलवर्दी का जवाब था 'हां, ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं, जिनमें से सिर्फ दो काम कर रहे हैं। इनमें से शायद एक दिल्ली पहुंच कर बम गिरा भी दे, लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा।' 

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हैदराबाद के भारत में विलय की कहानी - फोटो : Facebook/S NAik
निजाम की सेना ने किया आत्मसमर्पण

13 सितंबर, 1948 को भारतीय सेना मेजर जनरल जेएन चौधरी के नेतृत्व में हैदराबाद में घुसी। एचवी आर आयंगर बताते हैं कि 13 सितंबर को ही नेहरू ने सरदार पटेल को फोन कर जगा दिया। नेहरू ने कहा, 'जनरल बूचर ने मुझे फोन कर इस हमले को रुकवाने का अनुरोध किया है। मुझे क्या करना चाहिए?' पटेल का जवाब था, 'आप सोने जाइए। मैं भी यही करने जा रहा हूं।'

भारतीय सेना की इस कार्रवाई को 'ऑपरेशन पोलो' का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे। 108 घंटों तक चली इस कार्रवाई में 1,373 रजाकार मारे गए। हैदराबाद स्टेट के 807 जवानों की भी मौत हुई। भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
निजाम ने सरदार का हैदराबाद में किया स्वागत

इस बीच हैदराबाद में भारत सरकार के एजेंट जनरल के. एम. मुंशी ने पटेल को एक गुप्त टेलीग्राम भेजा, 'निजाम ने अपना दूत भेज कर भारतीय सेना के सामने अपने सैनिकों को आत्मसमर्पण की पेशकश की है। मैं रेडियो संदेश में इस पेशकश का एलान करने जा रहा हूं।'

सरदार पटेल को मुंशी की ये बात पसंद नहीं आई। उन्होंने आदेश दिया कि मुंशी से संपर्क कर उन्हें ये संदेश देने से रोका जाए। लेकिन जब तक मुंशी से संपर्क हो पाता वो रेडियो पर हैदराबाद की जनता को संबोधित कर चुके थे। अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि अब भारतीय सैन्य कमांडरों की बैठक निजाम के बेटे और क्राउन प्रिंस से होनी चाहिए। पटेल बहुत नाराज हुए। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि मुंशी ने अपने भाषण में ये बात क्यों कही? ये चाय की पार्टी नहीं, आत्मसमर्पण है। मैं चाहता हूं कि हैदराबाद की सेना भारतीय सेना के सामने औपचारिक रूप से अपने हथियार डाले।' 
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सरदार पटेल और हैदराबाद के निजाम - फोटो : Facebook/Subham Adhikari
18 सितंबर को जब मुंशी ने सरदार को फोन किया तो उन्होंने फोन पर ही उन्हें तगड़ी डांट पिलाई। फरवरी 1949 को जब सरदार पटेल का विमान हैदराबाद के बेगमपेट हवाईअड्डे पर उतरा तो निजाम हैदराबाद वहां मौजूद थे। इससे पहले जब सरदार ने अपने विमान की खिड़की से निजाम को देखा तो उन्होंने अपने सचिव वी शंकर से कहा, 'सो हिज एक्जॉस्टेड हाईनेस इज हियर।' लेकिन जब निजाम ने उनके सामने आकर अपना सिर झुका कर अपने हाथ जोड़े तो उन्होंने मुस्कराकर उनके अभिवादन का जवाब दिया। 
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