कौवे को सबसे चालाक पक्षी माना जाता है। बचपन में आपने चालाक कौवे की कहानी भी पढ़ी होगी, जिसमें एक प्यासा कौवा घड़े में कंकड़ डाल-डाल कर पानी को ऊपर लाता है। फिर अपनी प्यास बुझाता है। भले ही इस पक्षी की खोपड़ी में बहुत छोटा दिमाग हो, लेकिन ये जीरो का मतलब भी समझता है। इस बात का खुलासा हाल ही में एक स्टडी में हुआ है। वैसे जीरो की अवधारणा पांचवीं सदी में या उससे थोड़ा पहले दी गई थी। हालांकि, ये बात काफी हैरान करने वाली है कि कौवे भी इस अवधारणा को समझते हैं। जबकि, ना ही कभी इस पक्षी को जीरो के बारे ट्रेनिंग दी गई है और ना ही पढ़ाया गया है। ऐसे में ये कैसे संभव हो सकता है कि कौवे भी जीरो के बारे में समझते हैं। आइए पहले हम जीरो की अवधारणा को समझते हैं।
जीरो में किसी भी अन्य संख्या को जोड़ दिया जाए, घटा दिया जाए, गुणा या भाग कर दिया जाए, लेकिन जीरो का अस्तित्व कभी खत्म नहीं होता है।