घर के अंदर खेलकर कोई आगे नहीं बढ़ सकता, बाहर निकलना जरूरी है। उत्तराखंड में प्रतिभा की कमी नहीं है, बस मौका नहीं मिल रहा।
एशियन गेम्स में की शिरकत
यहां खेल हैं, लेकिन प्रतियोगिताएं नहीं होतीं। हरियाणा और पंजाब में ग्रास रूट को मजबूत बनाया जा रहा है, जबकि उत्तराखंड में ऐसा नहीं हो पा रहा। यह कहना है सियोल ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर रहे राजेंद्र सिंह रावत का।
भारतीय स्टेट बैंक नैनीताल में कार्यरत राजेंद्र सिंह रावत में वर्ष 1986 में एशियन गेम्स की हॉकी कांस्य विजेता भारतीय टीम में भी थे।
रावत ने कहा कि पहले संसाधन कम थे, फिर भी हम आगे बढ़ते रहे। फिजिकल फिटनेस पर अधिक मेहनत होती थी। बचपन में नैनीताल फ्लैट्स ग्राउंड में टूर्नामेंट देखा करते थे, तब बाहरी खिलाड़ियों से हॉकी मांगकर काम चलाते थे।
कई बार तो टूटी हॉकी जोड़कर भी मैच खेले। गोलकीपर के पैड भी रुई से बने होते थे, जो भीगने पर भारी हो जाते थे।
अजलान शाह हॉकी टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता
लखनऊ हॉस्टल में सेलेक्शन के बाद सफर चल निकला। 1981 में प्री-जूनियर वर्ल्ड कप, 1982, 85 में जूनियर वर्ल्ड कप में खेलने के बाद इसी साल अजलान शाह हॉकी टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता।
मौजूदा हॉकी टीम के बारे में राजेंद्र कहते हैं, टीम में काफी शानदार खिलाड़ी हैं। विदेशी कोच भी बेहतरीन हैं। इससे वर्ल्ड कप के लिए टीम की तैयारी अच्छी हो रही है।
उन्होंने उत्तराखंड में भी हॉकी हॉस्टल खोले जाने की बात कही, ताकि खिलाड़ियों को बेहतर कोचिंग और सुविधाएं मिल सकें।
पंजाब में सीनियर करते हैं मदद
पंजाब से निकल रहे हॉकी खिलाड़ियों के बारे में रावत ने कहा कि वहां सीनियर खिलाड़ी हॉकी को बढ़ाने देने के लिए आगे आए हैं। एकेडमी के जरिए खिलाड़ियों को तैयार किया जा रहा है।