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ग्रामीण भारत की असलियत

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ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलना फिलहाल सबसे जरूरी है, ताकि दस करोड़ वंचित परिवारों को विकास की मुख्यधारा में लाया जा सके। आठ दशक बाद हुई सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के आंकड़े; जातिगत आंकड़े हालांकि अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं, ग्रामीण भारत की असलियत दिखाकर सिर्फ चौंकाते ही नहीं हैं, अब तक की सरकारी नीतियों पर कमोबेश सवाल भी उठाते हैं।
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आजादी मिलने के बाद से ही देश में गरीबों और किसानों की स्थिति सुधारने की बातें की जाती रही हैं। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सबकी बेहतरी के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की थी, इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, तो आज से करीब ढाई दशक पहले उदार अर्थनीति की शुरुआत करने के पीछे यह भरोसा था कि उदारीकरण की लहर ग्रामीण भारत में बदलाव लाएगी।

पर ये आंकड़े बता रहे हैं कि लगभग साढ़े छह दशक की कवायदों के बावजूद जमीनी हकीकत बहुत नहीं बदली है। उच्च मध्य वर्ग की बढ़ती आबादी पर इतराते इस देश के गांवों में अब भी गरीबी है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल 24.39 करोड़ परिवार हैं, जिनमें 17.91 करोड़ परिवार गांवों में रहते हैं, शेष शहरों में।
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इन 17.91 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 10 करोड़ परिवार वंचित हैं, 23.52 प्रतिशत परिवारों में पच्चीस वर्ष से अधिक उम्र के शिक्षित लोग नहीं हैं, करीब 30 फीसदी परिवारों के पास जमीन नहीं है, तो लगभग 51 प्रतिशत परिवार दिहाड़ी मजदूर हैं।

जो देश आर्थिक महाशक्ति बनने की बात कर रहा है, उस देश के करीब 45 लाख परिवार दूसरों के घर में काम करके, लगभग चार लाख परिवार कचरा बीनकर और करीब साढ़े छह लाख परिवार भीख मांगकर गुजारा कर रहे हैं। बेशक कुछ भ्रम दूर भी हुए हैं।

मसलन, यह स्पष्ट हुआ है कि कुल ग्रामीण परिवारों का करीब 30 प्रतिशत ही जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। यानी कृषि पर आबादी का बोझ उत्तरोत्तर कम हुआ है; हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि खेती पर कम ध्यान दिया जाए।

बल्कि फिलहाल सबसे जरूरी ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलना है, ताकि दस करोड़ वंचित परिवारों को विकास की मुख्यधारा में लाया जा सके। सरकार कह रही है कि इन आंकड़ों से उसे बेहतर नीति नियोजन में मदद मिलेगी। उम्मीद करनी चाहिए कि जल्दी ही इस दिशा में पहल की जाएगी।
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