जाने माने न्यायविद फली एस नरीमन के बाद सर्वोच्च अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस के टी थॉमस ने भी लोकपाल के गठन से संबंधित सर्च कमेटी से खुद को अलग कर लिया है, जिससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थापित की जाने वाली इस सर्वोच्च संस्था के गठन की प्रक्रिया में ही कितनी खामियां हैं।
ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के चौतरफा आरोपों से घिरी यूपीए सरकार लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले किसी भी तरह लोकपाल की स्थापना करना चाहती है, ताकि यह जता सके कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह कितनी गंभीर है। उसका यह इरादा उन कथित अध्यादेशों में भी देखा जा सकता है, जिसे राष्ट्रपति ने रोक लिया है। मगर, प्रस्तावित लोकपाल का जैसा हश्र हो रहा है, वह सरकार के लिए वाकई शर्मिंदगी की वजह है।
यह दुखद है कि जिस लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक को संसद की मंजूरी मिलने में चार दशक से भी अधिक का समय लग गया, उसकी साख पर सवाल उठ रहे हैं। असल में गड़बड़ी इसकी चयन प्रक्रिया में ही नजर आ रही है, क्योंकि जो सर्च कमेटी प्रस्तावित है, उसकी सिफारिशों को मानने के लिए चयन समिति बाध्य नहीं है। इसी वजह से नरीमन ने आशंका जताई है कि दो चरण वाली चयन प्रक्रिया में सबसे योग्य और सक्षम लोगों को नजरंदाज किया जा सकता है।
वहीं जस्टिस थॉमस को लगता है कि सरकार इस सर्च कमेटी की आड़ में उन नामों को थोप सकती है, जिन्हें वह लोकपाल का सदस्य बनाना चाहती है। पांच सदस्यीय चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा इन चारों सदस्यों द्वारा आम सहमति से चयनित कोई कानूनविद को रखा जाना है।
इस समिति में पांचवे सदस्य के रूप में वरिष्ठ वकील पी पी राव की नियुक्ति पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को एतराज था, क्योंकि उनके मुताबिक राव कांग्रेस के वफादार रह चुके हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी ने तो इस लोकपाल को ही खारिज कर दिया है। जाहिर है, लोकपाल को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं किया गया, तो वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकेगा।