ऐसा बहुत कम होता है कि आर्थिक मोर्चे पर कई अच्छी खबरें एक साथ मिलें, पर भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ फिलहाल ऐसा ही है। अभी थोक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में आई रिकॉर्ड गिरावट से संभावना बनने ही लगी थी कि विश्व बाजार में कच्चे तेल में लगातार गिरावट की सूचना उत्साहित करने वाली है।
कच्चे तेल के दाम में आ रही यह कमी मांग घटने या यूरोप-अमेरिका की कमजोर आर्थिक स्थिति का संकेत नहीं, बल्कि बाजार में आपूर्ति बढ़ने का नतीजा है। अमेरिका में शेल गैस का उत्पादन बढ़ने से कच्चे तेल की मांग कम रह गई है, तिस पर गैर ओपेक देश अब तेल का भारी मात्रा में निर्यात कर रहे हैं। ऐसे में, तेल उत्पादक बड़े देश अगर आपूर्ति घटाकर कीमत बढ़ाने की अपनी पुरानी रणनीति पर चलना चाहें, तो भी सफल नहीं हो सकते। ऐसे में, माना यही जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमत अभी निचले स्तर पर बनी रहेगी।
यह भारत के लिए सुनहरा अवसर है, जो अपनी कुल ईंधन खपत का करीब 70 फीसदी आयात करता है। तेल मूल्य में कमी आने से तात्कालिक स्तर पर जहां पेट्रो उत्पादों के दाम घटने लगे हैं, वहीं आने वाले दिनों में चालू खाते का घाटा और राजकोषीय घाटे में कमी आने की भी उम्मीद है। असमान मानसून के कारण खरीफ उत्पादन कम रहने की आशंका और बाढ़ व चक्रवाती तूफान से हुए नुकसान की वजह से महंगाई दर में आई गिरावट के स्थायी होने की संभावना हालांकि कम है; खासकर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का ऊपर जाना तय है। वैसे भी खुदरा स्तर पर महंगाई कम होती नहीं दिखती।
इसके बावजूद रिजर्व बैंक के लिए पहल करने का यही उपयुक्त अवसर है। वह ब्याज दर में कमी न करने का यही तर्क देता रहा है कि महंगाई पर अंकुश लगाना उसकी पहली प्राथमिकता है। जबकि अभी थोक मूल्य सूचकांक पिछले पांच साल के निचले स्तर पर है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अपने सबसे निचले स्तर पर। ऐसे में, ब्याज दर घटाकर उद्योग-धंधों में जान फूंकने का काम जरूरी है। तब तो और भी, जब विगत जुलाई-अगस्त में औद्योगिक उत्पादन का आंकड़ा चिंतनीय रहा है। सिर्फ इस कारण ठिठकने का मतलब नहीं कि अमेरिकी फेडरल ब्याज दर बढ़ाने वाला है। अलबत्ता इस अवसर को अगर अपनी उपलब्धि में बदलना है, तो खुद सरकार को भी महंगाई दर को ऊपर जाने देने से रोकना होगा।