एशियन गेम्स 2014 में महिला हॉकी टीम ने कांस्य जीता। लौटे तो दूसरे राज्यों में खिलाड़ियों को बहुत सम्मान मिला। मुझे भी बड़ी उम्मीद थी, लेकिन राज्य सरकार की बेरुखी ने निराश किया।
'अब कभी उत्तराखंड के लिए नहीं खेलूंगी'
सोचा था कि अब कभी उत्तराखंड के लिए नहीं खेलूंगी। देर से ही सही सरकार के फैसले ने मुझे नया हौसला दिया है। एक खिलाड़ी को इससे ज्यादा क्या चाहिए। नौकरी और सम्मान देने के फैसले पर यह खुशी जाहिर की हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया ने।
2003 में पहली बार हॉकी स्टिक पकड़ने वाली वंदना कटारिया जब 11-12 साल की उम्र में लड़कों के साथ खेलने गई तो गांव वालों की नजरों में खटकने लगी थी।
वंदना ने ‘अमर उजाला’ से फोन पर हुई बातचीत में कहा कि जब मैंने हॉकी खेलना शुरू किया, तब माहौल अच्छा नहीं था। वंदना को सरकारी नौकरी मिलने से भारती महिला हॉकी टीम में खुशी की लहर है।
तब कुछ समय खेलना भी छोड़ा। पिताजी ने हमेशा साथ दिया। 2005 में लखनऊ हॉस्टल जाने के बाद पिताजी ने उधार लेकर मेरी जरूरतों को पूरा किया। 2008 में जूनियर महिला राष्ट्रीय टीम में जगह बनाई और फिर सीनियर वर्ग में।
कहा कि असली मुकाम 2013 में जूनियर महिला वर्ल्ड कप हॉकी के बाद मिला। वंदना से अब गांव और आसपास की दूसरी लड़कियों को हॉकी खेलने की प्रेरणा मिली है। भारतीय टीम की फारवर्ड खिलाड़ी वंदना यह बदलाव देखकर खुश हैं। कहती हैं, आज गांव में लोग लड़कियों को खेलने भेजने से रोकते नहीं हैं।
वंदना की उपलब्धियां
- जूनियर महिला वर्ल्ड कप हॉकी 2013 में कांस्य
- एशियन गेम्स 2014 में कांस्य
- जूनियर महिला एशिया कप 2011 में रजत
- जूनियर महिला एशिया कप 2008 में कांस्य
- सीनियर महिला एशिया कप 2013 में कांस्य
- एशियन चैंपियनशिप 2013 में रजत
- लीग राउंड टू इंटरनेशनल हॉकी टूर्नामेंट 2013 में स्वर्ण
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2013