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किए की सजा

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नीतीश कटारा के अपहरण और हत्या के करीब तेरह साल पुराने मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दोषियों की सजा की अवधि बढ़ाकर न्यायपालिका के प्रति वही भरोसा कायम किया है, जैसा करीब सात साल पहले इस हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट के फैसले से उपजा था। न्यायालय ने मुख्य अभियुक्त विकास और विशाल यादव को तीस-तीस साल कैद की सजा के साथ पचास-पचास लाख जुर्माना भी किया है। कैद की कुल अवधि में अस्पताल में बिताई गई अवधि शामिल नहीं होगी।
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दरअसल ट्रायल कोर्ट ने पहले अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। पर दिल्ली पुलिस और नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा ने दोषियों की फांसी की सजा की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में अपील की थी। हाई कोर्ट इस हत्याकांड को दुर्लभ में से दुर्लभतम भले न माने; और ऐसे में अभियोजन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाने का विकल्प अब भी खुला हुआ है। लेकिन एक बेहद हाई प्रोफाइल हत्याकांड में उसने जिस सख्ती का परिचय दिया है, उससे कानून के राज के प्रति उम्मीद बढ़ती ही है।

नीतीश कटारा की हत्या वस्तुतः दो जातियों और वर्गों के बीच पनपे प्रेम संबंधों से उपजे गुस्से का नतीजा थी, जिसे पहले ट्रायल कोर्ट ने, और अब उच्च न्यायालय ने भी, ऑनर किलिंग बताया है। नीतीश कटारा युवा बिजनेस एक्जीक्यूटिव थे, जबकि उनकी प्रेमिका भारती दबंग राजनेता डीपी यादव की बेटी थी। जिस तरह से शादी की एक पार्टी से नीतीश कटारा का अपहरण करके हत्या की गई, हत्या के सुबूत मिटाए गए, और भारती यादव को विदेश भेज दिया गया, वे दबंगई और राजनीतिक रसूख का ही उदाहरण थे। मानो यही कम न हो, अपराधी यह तर्क भी दे रहे थे कि उनका अपराध इतना बड़ा नहीं कि कठोर सजा मिले। लेकिन अदालत इन दबावों और दलीलों से बेअसर होकर अपना काम करती रही।
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पहले मुकदमे को उत्तर प्रदेश से दिल्ली लाया गया, फिर भारती यादव को गवाही के लिए विदेश से बुलाया गया। अब उच्च न्यायालय द्वारा सुनाई गई सख्त सजा का संदेश भी यही है कि कोई कितना भी रसूखदार क्यों न हो, वह कानून से बच नहीं सकता।
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