उत्तर प्रदेश के खाद्यान्न घोटाला मामले की जांच पर अब हाईकोर्ट निगरानी करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हाईकोर्ट की ओर से निगरानी किए जाने पर लगाई गई रोक को हटा लिया।
वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत में आश्वासन दिया है कि पांच मामलों में अभियोजन की अनुमति सरकार एक माह के भीतर दे देगी।
सर्वोच्च अदालत ने इस मसले पर प्रदेश सरकार की याचिका का निपटारा कर दिया।
जस्टिस एचएल दत्तू व जस्टिस जेएस खेहर की पीठ ने सभी पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर से रोक हटाते हुए राज्य की ओर से दिए गए आश्वासन को अपने आदेश में दर्ज कर लिया।
प्रदेश सरकार ने कहा कि 23 में से 18 मामलों में अनुमति प्रदान की जा चुकी है और शेष पांच मामलों में एक माह के भीतर अनुमति प्रदान कर दी जाएगी।
याद रहे कि सपा सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती बसपा सरकार की तरह ही करोड़ों के खाद्यान्न घोटाले की जांच पर सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट की ओर से निगरानी किए जाने की मुखालफत की है। जबकि मामले की जांच कर रही सीबीआई को अदालत की निगरानी से कोई आपत्ति नहीं है।
इस मामले में विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर हाईकोर्ट ने जांच का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2010 में खाद्यान्न घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अभियुक्त सरकारी अफसरों के खिलाफ अगर सरकार तीन माह के अंदर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देती तो इस देरी को सरकार की मंजूरी माना जाएगा।
सरकारी अफसरों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार की मंजूरी न लेने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रोक लगा दी थी। करोड़ों रुपये के इस घोटाले में राज्य के एक पूर्व मंत्री कई माह से जेल में हैं।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में उस याचिका पर आदेश दिया था जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले, गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों के लिए भेजा गया अनाज एक साजिश के तहत बांग्लादेश और नेपाल भेज दिया गया।
अंत्योदय, अन्नपूर्णा, मिड-डे मील, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के तहत केंद्र की ओर से प्रदेश को भेजा गया अनाज तस्करी के जरिए पड़ोसी देशों में भेज दिया गया।