महात्मा गांधी। यह केवल एक शख्स का नाम नहीं है। बल्कि यह शख्सियत, अपने भीतर एक पूरी विचारधारा, एक परंपरा, एक जीवनशैली और दूसरों को हर कदम पर प्रेरणा देने वाली जिंदगानी समेटे है।
दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टर रहे मोहनदास करमचंद गांधी भारत लौटकर महात्मा में तब्दील हो गए और उसी रोज से हिंदुस्तान भी बदलने लगा। देश को अंग्रेजों की बेड़ियों से रिहा कराने का काफी श्रेय इस शख्स को जाता है, जिसने अपने अहिंसक आंदोलनों से गोरों के सिर में दर्द किए रखा।
लेकिन ऐसा नहीं कि महात्मा गांधी ने केवल प्रशंसक ही बनाए। एक सिरफिरे कट्टरपंथी ने सिर्फ प्रेम की बोली बोलने वाले बापू की छाती में तीन गोलियां उतारते में जरा भी नहीं सोचा कि वह क्या करने जा रहा है। उनकी 66वीं पुण्यतिथि पर पढ़िए महात्मा गांधी की निर्मम हत्या से जुड़ी सनसनीखेज कहानी।
बेरेटा रिवॉल्वर से हुआ कत्ल
बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या की नाकाम कोशिश के बाद नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे मुंबई होते हुए पुणे लौट गए थे। दत्तात्रेय परचुरे और गंगाधर दंडवते की मदद से बेरेटा रिवॉल्वर खरीदी और 29 जनवरी, 1948 को दिल्ली पहुंच गए। ये लोग दिल्ली रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम 6 में ठहरे थे।
30 जनवरी को नाथूराम गोडसे ने बेहद करीब से महात्मा गांधी को तीन गोली मारी थी। जब यह घटना हुई, वह बिड़ला हाउस में ही एक प्रार्थना सभा में हिस्सा ले रहे थे। वहां उनके परिवार के सदस्य और समर्थक मौजूद थे।
महात्मा गांधी इस बार नहीं बच सके। हालांकि, इस हमले से पहले उनकी हत्या की पांच कोशिशें हो चुकी थीं, लेकिन वह हर बार खुशकिस्मत रहे। इस तरह का पहला जानलेवा हमला उन पर साल 1934 में हुआ था।
गोली चलाने से पहले गोडसे ने छुए गांधी के पैर
घटना वाली शाम माहौल में अजीब सी बेचैनी थी। शाम के करीब सवा पांच बजे थे। और घड़ी की सुई इस वक्त पर ऐसी थमी कि आज तक थमी है। जब बापू प्रार्थना के मंडप की ओर चार सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो करीब 35 साल के एक व्यक्ति ने उनसे प्रणाम किया।
यह शख्स गोडसे था। उसके और बापू के बीच फासला दो गज रहा होगा। उसने आगे की ओर झुकते हुए कहा, "आप आज प्रार्थना के लिए कुछ लेट हो गए।" इस पर गांधी मुस्कुराए और कहा, "हां, मुझे आज कुछ देर हो गई।"
लेकिन इसी मौके पर कुछ ऐसा हुआ, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। गोडसे ने रिवॉल्वर निकाली और तीन बार फायर किया। गोलियां उन्हें दिल के नीचे और पेट में लगी। वो गिर पड़े।
लेकिन उनके साथ मौजूद इवा गांधी और मनु गांधी ने उन्हें कसकर पकड़ लिया। कुछ देर में महात्मा दुनिया छोड़ गए।
गोडसे की खुदकुशी की बात में दम नहीं
गोली बेरेटा एम 1934 सेमी-ऑटोमेटिक पिस्टल चैम्बर्ड इन .380 एसीपी से मारी गई, जिसका सीरियल नंबर 606824 है। ऐसा बताया जाता है कि गोडसे ने इसके बाद खुद 'पुलिस' चिल्लाया और आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी।
एक किस्सा यह भी है कि गोली चलाने के तुरंत बाद वहां मौजूद भीड़ ने गोडसे को पकड़ लिया और उसे मारा। पुलिस ने इसके बाद उसे अपनी हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी।
घटना के वक्त गोडसे ने खाकी पैंट और ट्यूनिक (ढीला कुर्ता) पहन रखा था। यह भी कहा जाता है कि गोडसे ने बापू की हत्या के बाद खुदकुशी की कोशिश भी की, लेकिन इस दावे में दम नहीं दिखता।
पढ़िए गांधी की हत्या पर दर्ज एफआईआर
नंद लाल मेहता की ओर दर्ज एफआईआर में लिखा गया कि गांधीजी के अंतिम शब्द 'हे राम' थे। इस बारे में कोई स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं कि उन्हें अस्पताल ले जाने की कोशिश क्यों नहीं की गई।
एफआईआर में लिखा गया है, "लोग दोनों तरफ खड़े थे और महात्मा के गुजरने के लिए तीन फुट की जगह खाली छोड़ी गई थी। महात्मा ने परंपरागत तरीके से हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन किया।"
इसमें आगे है, "वह छह या सात कदम ही चले होंगे, जब पूना के रहने वाले व्यक्ति गोडसे ने दो या तीन फुट की दूरी से महात्मा पर पिस्टल से तीन गोलियां चलाईं और उनके पेट, छाती से खून निकलने लगा। वह पीछे की तरफ गिरे और उनके मुंह से निकला हे राम!"
जब बाउंड्री वॉल पर चढ़कर रोए नेहरू
महात्मा गांधी पर गोली चलने के बाद बिड़ला हाउस पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर ने अपनी किताब 'स्कूप' में लिखा है, "जब मैं वहां पहुंचा, तो गांधीजी के खून के निशान मौजूद थे। मैंने वहां की भीड़ में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल, शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद और रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को देखा।"
उन्होंने लिखा है, "मेरे पहुंचने के कुछ देर बाद गवर्नर जनरल माउंटबेटन वहां पहुंचे। बलदेव सिंह ने उनसे कहा कि शुक्र है कि हत्यारा पंजाबी नहीं है। और मुस्लिम भी नहीं है। हम इन तथ्यों को प्रसारित कर रहे हैं, क्योंकि कुछ शहरों में तनाव शुरू हो गया है।"
नय्यर ने लिखा, "बिड़ला हाउस में जुटे लोग गांधी अमर रहे के नारे लगा रहे थे और ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गुनगुना रहे थे। नेहरू बाउंड्री वॉल पर चढ़ गए और कहने लगे कि हमारी जिंदगी से रोशनी चली गई है। बापू नहीं रहे। हमें गर्माहट देने वाला सूरज डूब गया और हम अंधकार में ठंड से ठिठुरने के लिए रह गए।"
गांधी को हो गया था मौत का आभास?
कुलदीप नय्यर की किताब में उल्लेख है, "मैंने नाथूराम गोडसे को नहीं देखा। उसे बिड़ला हाउस के एक कमरे में ही बंद कर दिया गया था। कुछ दिन बाद मीडिया ने गांधी और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय के साथ बातचीत का हवाला दिया।"
उन्होंने इस बातचीत में सवाल उठाया था, "मेरे जीने का क्या मतलब है? न जनता और न सत्ता में बैठे लोगों को मेरे होने से कोई फर्क पड़ता है। करो या मरो का नारा (9 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में दिया गया नारा) इन हालात में मुझसे ज्यादा मेरी जगह ले लेता है।"
गांधीजी ने कहा था, "मेरी ख्वाहिश है कि जब मैं इस दुनिया से जाऊं तो आखिरी सांस के साथ ईश्वर का नाम हो।" बापू ने जब दुनिया छोड़ी थी, तो कुछ ऐसा ही हुआ। उनकी समाधि पर भी अंकित 'हे राम' यही याद दिलाते हैं।
'धमाका हुआ, तो गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी'
इत्तेफाक से नय्यर उस वक्त भी मौजूद थे, जब महात्मा गांधी पर इससे पहले जानलेवा हमला हुआ था। हालांकि, किस्मत अच्छी थी और उन्हें किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ। इस किताब में उन्होंने उसका जिक्र भी किया है।
नय्यर लिखते हैं, "मुझे याद आ रहा है कि कुछ दिन पहले ही मैं महात्मा की प्रार्थना सभा में मौजूद था। इसी रोज मदन लाल पाहवा ने उस प्लेटफॉर्म के पीछे धमाका किया था, जहां महात्मा गांधी अपना भाषण देने के लिए बैठे थे।"
उन्होंने लिखा है, "मैंने आवाज सुनी थी, लेकिन उसे पटाखे से ज्यादा कुछ नहीं समझा क्योंकि गांधी ने इस विस्फोट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। वह इस तरह व्यवहार कर रहे थे, जैसा कुछ हुआ न हो। मुझे अगले रोज के अखबारों से पता चला कि वह बम धमाका था।"