आजादी के बाद पहली बार करवाई गई सामाजिक, आर्थिक और जाति आधारित जनगणना, 2011 की शुक्रवार को जारी की गई रिपोर्ट में आर्थिक विकास की होड़ में शामिल भारत के ग्रामीण इलाकों की बदहाल तस्वीर उभरकर सामने आई है। विकास की चकाचौंध से सराबोर शहरी भारत यानी ‘इंडिया’ से ग्रामीण भारत अब भी कोसों दूर हैं।
आजादी के सात दशक बाद भी ग्रामीण क्षेत्र में आधी से अधिक आबादी अभी भी खेतिहर मजदूर है और उन्हें सिर्फ फसली मौसम में ही काम मिलता है, जबकि हर तीन में से एक परिवार भूमिहीन है।
देश में वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू किए जाने के ठीक दो दशक बाद करवाई गई यह जनगणना गांवों की बेहद डरावनी तस्वीर पेश करती है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आर्थिक उदारीकरण का लाभ उठाने में कहीं न कहीं हमारे गांव पिछड़ गए हैं। विशाल ग्रामीण आबादी में से महज ढाई करोड़ परिवारों के ही सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र या निजी यानी संगठित क्षेत्र से जुड़ा होना इसका प्रमाण है।
25 साल से अधिक उम्र को कोई भी साक्षर नहीं
पहली बार कागज रहित हैंड हेल्ड इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के जरिए देश के 640 जिलों में करवाई गई जनगणना की रिपोर्ट जारी करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि फिलहाल आर्थिक आधार पर ही आंकड़े जारी किए जा रहे हैं।
जाति आधारित आंकड़े बाद में जारी किए जाएंगे। लेकिन, इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बारे में जानकारी दी गई है।
ग्रामीण भारत में 21.53 फीसदी परिवार एसटी/एससी की श्रेणी में आते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि एक चौथाई ग्रामीण परिवारों में 25 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति साक्षर नहीं है।
वित्त मंत्री ने आंकड़ों को बताया शानदार दस्तावेज
वित्त मंत्री ने इन आंकड़ों को एक शानदार दस्तावेज बताते हुए कहा कि इसके आधार पर ग्रामीण इलाकों के लिए सरकार को योजना बनाने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि इसके सहारे ग्रामीण क्षेत्रों के 17.9 करोड़ के साथ कुल 24.39 करोड़ परिवारों की जानकारी मिली है। इनमें से 10.69 करोड़ ग्रामीण परिवारों की हालत दयनीय है।
करीब 10 लाख परिवार कूड़ा चुनकर और भीख मांगकर गुजर बसर करता है। वित्त मंत्री के मुताबिक इन आंकड़ों से बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। गरीबी रेखा का निर्धारण आसान होगा तथा सब्सिडी का आवंटन भी सुविधाजनक होगा। इससे पहले 1931 में जातिगत आधार पर जनगणना कराई गई थी।
आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण परिवारों में महज 4.6 फीसदी लोग ही आयकर देते हैं। आयकर देने वाले एससी के परिवारों की संख्या 3.49 फीसदी और एसटी परिवारों की संख्या 3.34 फीसदी है। ग्रामीण क्षेत्र में 30.10 फीसदी परिवारों की आमदनी का स्रोत कृषि है।
मोबाइल फोन के मामले में यूपी के गांव सबसे आगे
जनगणना 2011 के मुताबिक गांवों में मोबाइल फोन के मामले में यूपी के गांव
सबसे आगे हैं, जबकि उत्तराखंड इस मामले में दूसरे
स्थान पर है।
नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ सबसे निचले पायदान पर है। यूपी के गांवों
में 86.63 फीसदी घरों में जबकि उत्तराखंड में 86.60 फीसदी घरों में मोबाइल फोन है। छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 28.47 फीसदी है।
गांवों के बारे में कुछ अहम आंकड़े
जनगणना 2011 के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में 29.43 फीसदी परिवार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से आते हैं।
इनमें सबसे अधिक 36.74 फीसदी एससी और एसटी परिवार पंजाब के गांवों में रहते हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के गांवों में 28.45 फीसदी, तमिलनाडु में 25.55 फीसदी और हिमाचल प्रदेश में 23.97 फीसदी एससी और एसटी परिवार रहते हैं।
75 फीसदी ग्रामीण परिवार के सदस्यों की मासिक आय 5 हजार से कम
सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना के शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार देश के करीब तीन-चौथाई ग्रामीण घरों में सबसे अधिक कमाने वाले सदस्यों की मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है।
जनगणना आंकड़ों के अनुसार 13.34 करोड़ (74.49 फीसदी) परिवारों के ‘सबसे अधिक कमाने वाले सदस्यों की मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है। सिर्फ 1.48 करोड़ (8.29 फीसदी) ग्रामीण परिवार ही ऐसे हैं जिनके सदस्यों की मासिक आय 10 हजार रुपये प्रतिमाह या उससे अधिक है।
ग्रामीण परिवार में नौकरी करने वाले सदस्य महज 9.68 फीसदी हैं। आंकड़ों के अनुसार इनमें से 5.02 फीसदी सरकारी नौकरी, 1.12 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्र और शेष 3.58 फीसदी लोग निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं। यह जनगणना देश के 640 जिलों में 6.4 लाख इलेक्ट्रोनिक उपकरण की मदद से की गई है।