भारत में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, न तो गर्भ के भीतर और न ही बाहर।
एक अमेरिकी स्टडी में तथ्य सामने आया है कि भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में लड़की से भेदभाव उनके जन्म के पहले ही शुरू हो जाता है।
इसके अनुसार अगर महिला के गर्भ में पल रहा शिशु लड़का है, तो उसकी ज्यादा बेहतर देखभाल की जाती है।
अमेरिका की मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी के ले लाकड़ावाला और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रशांत भारद्वाज ने अपनी स्टडी में पाया कि लिंग के आधार पर भेदभाव गर्भ से ही शुरू हो जाता है।
अर्थशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर लाकड़ावाला ने कहा कि यह समाज की बेहद दयनीय तस्वीर दिखाती है।
उन्होंने एक बयान में कहा कि भले ही भारत में जन्म से पहले सेक्स की पहचान करना और इस आधार पर गर्भपात करना दोनों ही गैर कानूनी हैं, लेकिन यह प्रचलन देश में आम है।
अल्ट्रासाउंड के जरिए शिशु के लिंग की पहचान होने के बाद जिन महिलाओं का गर्भपात नहीं होता है, उन्हें भी कई तरह के भेदभाव से गुजरना पड़ता है।
30 हजार से ज्यादा भारतीयों पर नेशनल हेल्थ सर्वे के डाटा की स्टडी करने के बार इन शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं के गर्भ में लड़का होता है, उन्हें पहले से डॉक्टर से अपॉइंटमेंट्स लेना और आयरन की गोलियां देने जैसी बेहद मेडिकल सुविधाएं दी जाती हैं।
जबकि इसके विपरीत स्थिति में महिला को घर में ही बच्ची को जन्म देना पड़ता है और उन्हें टेटनस के इंजेक्शन भी नहीं लगते। भारत में नवजात शिशु की मौत का बड़ा कारण टेटनस ही है।
स्टडी के मुताबिक जिन महिलाओं के टेटनस के इंजेक्शन नहीं लगते, उनके बच्चे या तो कम वजन के पैदा होते हैं या फिर जन्म के कुछ समय बाद ही मर जाते हैं।
भारत के अलावा चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी इस तरह के मामले ज्यादा पाए जाते हें। मगर श्रीलंका, थाइलैंड और घाना को पुरुष प्रधान देश नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके खिलाफ ऐसे कोई सुबूत नहीं मिले। यह स्टडी ह्यूमन रिसॉर्स ऑफ जनरल में प्रकाशित हुई है।