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यहां हिंदू ना शव जला सकते हैं, ना दफना सकते हैं!

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पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत कितनी खराब है, इसका अंदाजा भले हो, लेकिन यह खबर पढ़कर दिल दहल जाएगा। यहां बसे हिंदू और सिख परिवारों को अपने मृत संबंधियों का दाह-संस्कार करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
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हालात यह हैं कि हिंदू-सिख परिवार अपने संबंधी की मौत पर दाह संस्कार की रस्म अदायगी करने को मजबूर हैं। मृतक की दायीं हथेली पर गर्म सिक्का रखकर दाह संस्कार की रस्म पूरी करने के बाद शव को दफना दिया जाता है।

35 हजार की हिंदू-सिख आबादी वाले खैबर पख्तूनख्वा राज्य में भी कोई श्मशान घाट नहीं है। मजबूरन लोगों के पास अंतिम संस्कार के लिए दो ही रास्ते बचते हैं।

मौत के बाद एक और बार मरना!

ऐसे लोगों के सामने पहला रास्ता यह है कि वे अपने संबंधी के शव को लेकर खैबर एजेंसी के तिराह घाटी, डेरा इस्माइल खां, बन्नू, कोहाट, मालाकंद, सवात, बुनेर, नौशहरा इलाके में जाकर दाह संस्कार करें या फिर शव की हथेली पर गर्म सिक्का रखकर दाह संस्कार की रस्म पूरी करें।

पेशावर में बसे अल्पसंख्यकों को भी सैकड़ों मील का सफर तय करके हस्सन अबदाल (पंजा साहिब) में दाह संस्कार करने आना पड़ता है। इस यात्रा के लिए उन्हें 40 से 70 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ता है, जोकि पाकिस्तान में आम हिंदुओं और सिख परिवारों की पहुंच से बाहर है।

श्मशान घाट पर भूमाफिया का कब्जा!

हाल ही में कोहाट में हिंदू-सिख परिवारों के मृत संबंधी के दाह संस्कार की उक्त रस्म अदायगी सामने आने के बाद खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने ख्वाजाखेल, मालाकंद, अटक खैराबाद और पेशावर कैंट में हिंदू मंदिरों में हिंदुओं और सिखों को दाह संस्कार की अनुमति तो दे दी है, लेकिन वहां अधिकांश मंदिरों पर भूमाफिया का पहले से ही कब्जा है।

नतीजतन मंदिरों में अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी कर पाना संभव नहीं रह गया है। पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों की इस समस्या को लेकर आज तक न तो भारत सरकार ने और न ही देश-विदेश की किसी हिंदू-सिख संस्था ने यह मामला उठाया है।

इस बीच, शिव सेना राष्ट्रवादी के नेता जय गोपाल लाली ने कहा है कि उनकी पार्टी इस मुद्दे को पूरे सबूतों के साथ केंद्र सरकार के ध्यान में लाएगी और मांग करेगी कि पाकिस्तान सरकार से बातचीत कर वहां बसे हिंदु-सिखों को दाह संस्कार का अधिकार दिलाया जाए।

अफगानिस्तान में भी हालात बदतर!

इतिहास शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ का कहना है कि अफगानिस्तान में बसे सिखों को भी ऐसी ही समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अगर वे काबुल के कलेचा-ए-बिन-ए-हिसार में मौजूद श्मशान घाट में अंतिम संस्कार करने पहुंचते हैं, तो वहां अवैध कब्जा जमा चुके मुस्लिम समुदाय के लोग उन्हें अंतिम संस्कार करने से मना कर देते हैं।

वे कहते हैं चिता से उठने वाले धुएं से वातावरण दूषित होगा। हालात इतने बदतर हैं कि अफगानिस्तान के जो सिख विरोध करते हुए वहां अंतिम संस्कार के लिए पहुंचते हैं, उन पर मुस्लिम समुदाय के लोग पथराव करके उन्हें भागने को मजबूर कर देते हैं और शव का अपमान करते हैं।

शव सड़क पर फेंक देते हैं!

कोछड़ के अनुसार, पिछले साल 6 अक्तूबर को सिंध के कुमदर कारोमल गांव में 30 वर्षीय दलित हिंदू भूरू भील का जब उसके परिजन दाह संस्कार करने लगे तो स्थानीय मुसलमानों ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि इस्लामिक देश में वे किसी मृतक को जलाने की अनुमति नहीं देंगे।

इस पर हिंदुओं ने मृतक के शव को हज फकीर कब्रिस्तान में दफना दिया। बाद में मुस्लिमों ने वहां पहुंचकर कब्र खोद डाली और भील का शव निकालकर घसीटते हुए मुख्य सड़क पर फेंक दिया। करीब आठ घंटे तक मृतक का शव लावारिस हालत में पड़ा रहा। पुलिस ने दोषी पाए गए 19 लोगों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की है।

बांग्लादेश्‍ा में पिट रहे हैं हिंदू!

बांग्लादेश में वोट डालने वाले हिंदू परिवार एवं अन्य अल्पसंख्यक विपक्षी दलों के निशाने पर आ गए हैं। मतदान के बाद कई इलाकों में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों पर हमले की खबरें हैं। हिंदू नेताओं एवं मानवाधिकार संगठनों ने अल्पसंख्यकों के लिए और सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है।

बीएनपी और उसकी सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं ने पश्चिमी जेसोर, उत्तर पश्चिमी दिनाजपुर और अभयंगर इलाके में हिंदू परिवारों पर हमला किया। कई अखबारों ने सोमवार को रिपोर्ट में बताया कि चुनावों के बहिष्कार के आह्वान को दरकिनार कर हिंदुओं द्वारा वोट देने पर विपक्षी कार्यकर्ताओं ने यहां 130 हिंदू परिवारों के घरों में तोड़फोड़ की।

मालोपाड़ा गांव में 10 हिंदुओं के घरों में आग लगा दी गई। पुलिस के मुताबिक 70-80 लोगों ने गांवों पर हमला बोला लेकिन अर्द्धसैनिक बल और पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया। बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने हिंदुओं को मतदान करने पर गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी है। अफरातफरी फैलने पर सेना के त्वरित बल को हस्तक्षेप करना पड़ा।
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आवामी लीग के समर्थक हैं हिंदू!

मेजर रहमान ने रविवार रात कहा, ‘हम चुनाव ड्यूटी पर थे। इसके बावजूद गांववालों को बचाने के लिए हमें यहां अस्थायी पुलिस शिविर लगाना पड़ा।’ हिंदू-बौद्ध-क्रिश्चियन ओकिया परिषद के उपाध्यक्ष काजल देवनाथ ने पीटीआई को बताया, ‘करीब 400 हिंदुओं को हिंसा की आशंका के चलते अपने घरों को छोड़कर स्थानीय भैरव नदी के दूसरी ओर शरण लेने पर मजबूर होना पड़ा।’

दिनाजपुर के पूर्णियां इलाके में भी हिंदुओं पर हमले हुए। विपक्षी कार्यकर्ताओं ने वोट डालने पर 10 बुजुर्ग हिंदुओं पर जानलेवा हमला किया और घरों में आग लगा दी। देवनाथ ने हिंदुओं सहित अल्पसंख्यकों के लिए और कड़ी सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है।

आम धारणा है कि बांग्लादेश में हिंदू पारंपरिक तौर पर अवामी लीग के समर्थक हैं। आवामी लीग धर्म निरपेक्षता की नीति पर चल रही है। देवनाथ ने कहा, ‘हम हिंदुओं को राजनीति से दूर रखें। हम शिकार नहीं बनना चाहते।’ लालमोनिरहाट व सतखिरा इलाके में बहुत कम हिंदुओं ने वोट डाले। यहां अल्पसंख्यक डरे हुए हैं।
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