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पढ़िए, UPPSC अध्यक्ष अनिल यादव के विवादों की पूरी फेहरिस्त

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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने बुधवार को अवैध करार दे दिया। दो अप्रैल 2013 को अध्यक्ष का कार्यभार संभालने वाले डॉ. अनिल के कार्यकाल के दौरान आयोग भर्ती के लिए कम, विवादों के लिए ज्यादा जाना गया। भर्तियों को लेकर पहले भी समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं, लेकिन डॉ. अनिल के अध्यक्ष बनने के बाद से तो जैसे आयोग का विवादों से ही नाता हो गया।
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विवाद की शुरुआत उनके ज्वाइन करने के मात्र एक महीने बाद मई 2013 में ही हो गई थी। आयोग की भर्तियों की त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू करने के विरोध में जो आंदोलन शुरू हुआ तो अब तक जारी है। आयोग के इतिहास में पहली बार पीसीएस-2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर भी आउट हुआ और एक प्रश्न पत्र की दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। चार ऐसे मौके आए जब आयोग को फैसला बदलना पड़ा। आयोग की ओर से गलत उत्तर सही माने जाने की शिकायत तकरीबन हर भर्ती परीक्षा में है। इसे लेकर परीक्षा स्थगित किए जाने की मांग भी लगातार उठती रही है।

डॉ. अनिल के अध्यक्ष बनने के एक महीने बाद आयोग बोर्ड की मई 2013 में हुई बैठक में भर्तियों में आरक्षण की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया। इसके विरोध में प्रतियोगियों के प्रदेशव्यापी आंदोलन के बाद प्रदेश सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा तो फैसला वापस हुआ। इसी क्रम में पीसीएस-2011 फाइनल रिजल्ट सबसे अधिक विवादों में रहा जिसके बाद आयोग को ‘जातिविशेष’ का आयोग माना जाने लगा। इस भर्ती परीक्षा में एक जाति के ज्यादा लोग सफल हुए।
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परिणामस्वरूप आंदोलनरत प्रतियोगियों ने साक्षात्कार में शामिल प्रत्येक अभ्यर्थी को मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में मिले अंकों का विवरण इकट्ठा किया जिससे साफ था कि ‘जातिविशेष’ के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में खुलकर नंबर बांटे गए, जबकि दूसरे लोगों को काफी कम नंबर मिले। फिर तो आयोग ने अभ्यर्थियों के प्राप्तांक देखने की प्रक्रिया काफी जटिल कर दी है। हालांकि प्रतियोगियों के ढाई साल के संघर्ष के बाद डॉ. अनिल यादव की नियुक्ति तो अवैध हो गई लेकिन भर्तियों की सीबीआई जांच की उनकी लड़ाई अब भी जारी है।

बार-बार क्यों बदलने पड़े परिणाम

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अध्यक्ष बनने के बाद डॉ. अनिल यादव की ओर से घोषित पहला परिणाम, पीसीएस-2011 सबसे विवादित रहा। आरक्षण की त्रिस्तरीय व्यवस्था हटाने के बाद इसे दोबारा घोषित किया गया। इतना ही नहीं कई प्रश्नों के जवाब को लेकर आयोग को पीसीएस-2011 मुख्य परीक्षा का भी रिजल्ट संशोधित करना पड़ा। पीसीएस-जे 2011 प्रारंभिक परीक्षा के एक पेपर में 13 सवाल ऐसे थे, जिनके गलत जवाब को आयोग ने सही माना। अभ्यर्थियों की आपत्ति के बावजूद उसी आधार पर रिजल्ट घोषित किया गया लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद संशोधित रिजल्ट जारी किया गया।

न्यायालय के आदेश के बाद लोअर सबऑर्डिनेट-2013 प्रारंभिक परीक्षा भी आयोग को एक दिन पहले स्थगित करनी पड़ी थी। इसके पदों पर 2009 के बाद भर्ती हो रही थी। इसके बावजूद अभ्यर्थियों को आयु सीमा में कोई छूट नहीं दी गई थी। इसके विरोध में प्रतियोगियों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसके अलावा कृषि विभाग में तकनीकी सहायक समेत कई भर्तियों में न्यूनतम योग्यता को लेकर अभ्यर्थी लगातार आंदोलनरत हैं। खास यह इन भर्तियों की लिखित परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी सफल कर दिए गए लेकिन साक्षात्कार देने के लिए पहुंचने पर बताया गया कि वे इस पद की न्यूनतम योग्यता ही नहीं रखते।

आश्चर्यजनक यह कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में पीसीएस-2012 की कॉपियां जला दी गईं। आयोग ने आरटीआई के तहत मांगे गए जवाब में खुद यह जानकारी दी। इससे पहले उत्तर पुस्तिकाओं को रद्द करने की नियमावली भी संशोधित की गई। इतना ही नहीं कापियां जलाने का प्रकरण तब हुआ जब पीसीएस-2011 समेत आयोग की पिछली सभी भर्तियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रतियोगियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल है।

गलत जवाब बने हुए हैं ‘यक्ष प्रश्न’

पीसीएस-जे प्रारंभिक परीक्षा में 17 प्रश्नों के उत्तर बदलने पड़े। अभ्यर्थियों की आपत्ति के बाद रिजल्ट भी संशोधित करना पड़ा। पीसीएस-2013 में कई मेधावी अभ्यर्थियों का चयन गलत जवाब की वजह से नहीं हो सका। अभ्यर्थी न्यायालय में गए तो उन्हें बताया कि गलत प्रश्न और गलत जवाब रखने वाले एक्सपर्ट डिबार कर दिए गए हैं।

आयोग की ओर से यह भी आदेश जारी किया गया कि रिजल्ट के साथ संशोधित आंसर की भी जारी की जाएगी। इसके बाद भी गलत प्रश्न और जवाब का सिलसिला पीसीएस की अगली भर्तियों, आरओ-एआरओ आदि में भी जारी रहा। इन भर्तियों में भी आपत्ति के बाद 13-13 प्रश्नों के जवाब बदलने पड़े। आर-एआरओ-2013 प्रारंभिक परीक्षा में गलत जवाब को लेकर हाईकोर्ट ने डॉ. अनिल यादव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के लिए कहा था हालांकि सुप्रीम कोर्ट से डॉ. अनिल को राहत मिल गई थी।

आमतौर पर व्यवस्था होती है कि साक्षात्कार में अभ्यर्थी को न्यूनतम 40 फीसदी तथा अधिकतम 80 फीसदी अंक दिए जा सकते हैं। इससे कम या अधिक अंक दिए जाने पर साक्षात्कार पैनल में शामिल विशेषज्ञों को कारण बताना होता है लेकिन पीसीएस-2011 में इस मानक का ध्यान नहीं रखा गया न ही आयोग ने बताया कि साक्षात्कार को लेकर क्या नीति है।

आयोग में रिजल्ट तैयार करते समय स्केलिंग पद्धति का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें अभ्यर्थी को मिले तथा परीक्षक द्वारा दिए गए अंक में काफी अंतर हो जाता है। इसके विरोध में भी प्रतियोगी लगातार आंदोलनरत हैं।

व्यक्तिगत तौर पर लगते रहे आयोग अध्यक्ष पर आरोप

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव के मात्र ढाई वर्षों के में उनके साथ तकरीबन दो दर्जन विवाद जुड़ गए। खास यह कि उनकी नियुक्ति पर ही लगातार सवाल उठते रहे। डॉ. अनिल इससे पहले आयोग में छह साल सदस्य भी रहे। लगातार यह विवाद का विषय रहा कि मानक के अनुसार उनकी नियुक्ति नहीं हुई है।

खास वर्ग और क्षेत्र के लोगों को तवज्जो देने सहित उनकी कार्यशैली पर साक्षात्कार पैनल, पेपर सेटिंग, मूल्यांकन में भी खास वर्ग के लोगों को शामिल करने के  आरोप लगे। इससे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ज्यादातर वरिष्ठ शिक्षकों ने आयोग के साक्षात्कार पैनल में शामिल होने तथा मूल्यांकन से मना कर दिया। विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने तो आयोग पर अच्छा व्यवहार नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया है।

डॉ. अनिल पर अफसरों और कर्मचारियों के साथ तानाशाही रवैया अपनाने का भी आरोप लगा। कर्मचारियों को आयोग की भर्तियों में धांधली तथा अध्यक्ष के खिलाफ बोलना भी भारी पड़ा। चार कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है। खास यह कि इसके खिलाफ यूनियन ने आवाज उठाई, धरना भी दिया लेकिन बाहर किसी की बोलने की हिम्मत नहीं हुई। सबकुछ आयोग परिसर के भीतर हुआ। डॉ. अनिल पर साक्षात्कार के लिए पहुंचे अभ्यर्थियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करने का भी आरोप है।

शायद यह डॉ. अनिल यादव के कार्यकाल में ही संभव था कि इंटरव्यू पैनल में शामिल विषय विशेषज्ञों के नाराज होकर जाने के बावजूद साक्षात्कार लिया गया। राजकीय महाविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिए हुए साक्षात्कार में बीएचयू के प्रोफेसर चौथीराम और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर मुश्ताक अली को बतौर विषय विशेषज्ञ पैनल में शामिल किया गया था लेकिन आयोग के सदस्य ने उनके साथ दुर्व्यवहार कर दिया। इसके विरोध में दोनों बिना इंटरव्यू लिए ही वापस चले गए और उन्होंने आगे से आयोग में न जाने का भी निर्णय ले लिया। इसके बावजूद उस दिन साक्षात्कार हुआ। एक्सपर्ट कहां से पहुंचे, यह अब भी सवाल बना हुआ है।

जब आयोग पर लगा जाति विशेष का तमगा

डॉ. अनिल यादव के कार्यभार संभालने के बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों में एक जाति विशेष के अभ्यर्थियों की सफलता का ग्राफ अचानक बढ़ गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि प्रतियोगियों ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा का नाम भी उसी जाति पर रख दिया। इस दौरान घोषित पीसीएस-2011, 12 और 13 की ही बात करें तो 86 में से 56 एसडीएम की नियुक्तियां सिर्फ एक ही जाति विशेष से हैं। इसी तरह प्रदेश सरकार की अन्य भर्तियों में भी 50 फीसदी से अधिक पदों पर इसी जाति विशेष के लोगों के चयन का आरोप है।

प्रदेश की कई भर्ती संस्थाओं के मुखिया भी इसी जाति विशेष से जुड़े रहे। आरक्षण की पुरानी व्यवस्था लागू करने के बाद पीसीएस-2011 मुख्य परीक्षा का रिजल्ट संशोधित करना पड़ा। इसमें 176 अभ्यर्थी बाहर हो गए। इनकी जगह 151 नए अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया गया। प्रतियोगियों के अनुसार बाहर किए अभ्यर्थियों में ज्यादातर एक ही जाति के थे। आश्चर्यजनक यह कि इस परीक्षा के एक ही पेपर में स्केलिंग के बाद एक खास जाति के लोगों के 60 से भी अधिक नंबर बढ़ गए।

इसके विपरीत उसी पेपर में दूसरों के नंबर घट गए। इतना ही नहीं एक जाति के अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में 135 से 141 तक अंक दिए गए। जबकि ज्यादातर अभ्यर्थियों को 121 तक अंक मिले। इसका नतीजा रहा कि इस भर्ती परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों की सूची में ज्यादातर एक ही जाति के रहे। इतना ही नहीं सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) भर्ती के अंतिम परिणाम में एससी की सीट पर ओबीसी अभ्यर्थी का चयन कर लिया गया। मामला सामने आने के बाद मानवीय चूक बताकर आयोग ने रिजल्ट संशोधित कर दिया लेकिन इसके बाद भी उस अभ्यर्थी का चयन हुआ। उसकी जगह ओबीसी के दूसरे अभ्यर्थी को बाहर किया गया।
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1200 ओबीसी में ज्यादातर एक ही जाति के

आयोग की ओर से कृषि विभाग में तकनीकी सहायकों के 6628 के लिए पर भर्ती की गई। गौर करने वाली बात यह रही कि विज्ञापन के बाद इसमें अन्य वर्ग की सीटें कम करके ओबीसी में शामिल करने का आरोप है। इतना ही नहीं अंतिम परिणाम में कुल चयनितों में 3116 ओबीसी के हैं। हालांकि आयोग ने अंतिम परिणाम में चयनितों के नाम नहीं बताए हैं लेकिन अभ्यर्थियों का आरोप है कि ओवरलैपिंग करके चयनित तकरीबन 1200 ओबीसी में ज्यादातर एक ही जाति के हैं।

सीधी भर्ती में भी विशेष वर्ग के अभ्यर्थियों को खास तवज्जों दी गई है। प्रतियोगियों ने 23 भर्तियों का डिटेल जुटाया है। इसमें ओबीसी के लिए निर्धारित सीट से डेढ़गुना से भी अधिक पद पर एक खास जाति के अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। प्रवक्ता इलेक्ट्रानिक्स के कुल 41 पद में से 23 का चयन इसी जाति का चयन हुआ है। इसमें ओबीसी की 10 सीट है। इसी तरह से जूनियर इंजीनियर कम्प्यूटर के 48 पद के लिए 20 एक ही जाति के चयनित हुए हैं। यही स्थिति कमोवेश अन्य भर्तियों में भी है।

लोअर सबऑर्डिनेट-2008 और 2009 के अंतिम परिणाम महीनों पहले घोषित हो चुके हैं लेकिन इनमें शामिल अभ्यर्थियों की मार्कशीट अभी तक जारी नहीं की गई। हालांकि आंदोलनरत प्रतियोगियों का दावा है कि उन्होंने 2008 में चयनित एक खास जाति के अभ्यर्थियों की मार्कशीट शासन से हासिल की है। इनमें 72 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में 50 में से 34 और 35 अंक मिले हैं। आंदोलनरत प्रतियोगियों ने ऐसे अभ्यर्थियों की सूची भी जारी की है।
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