अब नहर के गंगा में समा जाने के बाद पूरे मामले की पड़ताल कराई गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। इस परियोजना की मॉनिटरिंग और गुणवत्ता जांच की जिम्मेदारी प्रयागराज के मुख्य अभियंता को सौंपी गई थी, मगर वे एक बार भी प्रोजेक्ट का मौके पर निरीक्षण करने नहीं पहुंचे। जांच में पाया गया कि जुलाई महीने में वे सेवानिवृत्त भी हो गए हैं।
यहां बता दें कि गंगा पार रेती की ओर रामनगर से राजघाट के बीच 5.3 किलोमीटर लंबी और 45 मीटर चौड़ी बाईपास नहर बनाई जा रही है। जुलाई महीने में आई बाढ़ में नहर की मिट्टी गंगा में समा कर पूरी परियोजना गंगा की धारा में बह गई।
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जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने कहा कि गंगा में नहर परियोजना के लिए जिम्मेदार सभी विभागों से समन्वय किया गया है। यूपीपीसीएल नहर को रिस्टोर करेगी और इसके बाद ही उसे भुगतान किया जाएगा। जांच में सामने आई गड़बड़ियों की रिपोर्ट शासन को भी भेजी गई है।
नहर के गंगा में समा जाने के बाद मचे बवाल के बाद अब परियोजना की समीक्षा शुरू कराई गई है। इसमें यूपीपीसीएल को परियोजना पूरी करने का आदेश जारी किया गया है। एमओयू के आधार पर ही नहर को मूल स्वरूप देना होगा। उधर, सिंचाई विभाग को वाराणसी के नदी वैज्ञानियों की ओर से उठाए गए सवालों के अध्ययन और समाधान के लिए भी कहा गया है। परियोजना के पूरी होने और हैंडओवर के बाद ही यूपीपीसीएल को बकाया भुगतान किया जाएगा।