संसद में आज पी चिदंबरम आम बजट पेश करने वाले हैं। अगला महीना वार्षिक कर नियोजन का है। ज्यादातर वेतनभोगियों के लिए यह साल का ऐसा वक्त होता है, जब उनकी जेब में आने वाली रकम में अचानक कमी हो जाती है। दरअसल, उनके वेतन से आयकर का हिस्सा खुद-ब-खुद कट जाता है। इस कटौती की बड़ी वजह है कि कई लोग आयकर में बचत के लिए पीएफ के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं करते।
हमारे नीति नियंताओं ने सभी करदाताओं को एक समान मानने के दृष्टिकोण के तहत आयकर कानून की धारा 80-सी के तहत एक लाख रुपये तक के कर बचत साधन का प्रावधान किया है। वैसे तो यह समानता आदर्श रूप में दिखती है, पर वास्तव में यह सभी करदाताओं के लिहाज से व्यावहारिक नहीं है, और समानता के नाम पर असमानता पैदा करती है। जैसे, सभी करदाताओं के लिए धारा 80-सी के तहत एक लाख रुपये तक की कर बचत सीमा तय की गई है, जिसका मतलब यह है कि किसी की आय की परवाह किए बगैर सभी के लिए यह सीमा समान है।
कई समाजशास्त्री इस समानता के महत्व पर तर्क दे सकते हैं। पर इन संख्याओं के पीछे बहुत कुछ छिपा हुआ है। मसलन, मान लीजिए किसी व्यक्ति की सालाना आय अगर तीन लाख रुपये है, तो उसे शून्य करदेयता की स्थिति हासिल करने के लिए आय का 33 फीसदी बचत करना होगा या फिर उन साधनों में निवेश करना होगा, जो धारा 80-सी के तहत आने वाले प्रावधानों पर खरे उतरते हों।
अब अगर हम 10 लाख रुपये सालाना कमाने वाले व्यक्ति से तुलना करें, तो उसे कर में छूट हासिल करने के लिए अपनी आय का केवल 10 फीसदी बचत करना होगा। अब यह समझना किसी के लिए भी आसान है कि कर बचाने के लिए अधिक आय वाले व्यक्ति की तुलना में कम आय वाले व्यक्ति के लिए निवेश करना ज्यादा कठिन है। वित्त संबंधी स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार, करदाताओं में 20 लाख रुपये से ज्यादा आय वालों की संख्या दो फीसदी से भी कम है, इसके बावजूद कुल संग्रह में उनकी हिस्सेदारी 63 फीसदी की है। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और साबित करते हैं कि वित्त मंत्रालय की कर संग्रह योजना में विषमता है।
मुद्रास्फीति के लगातार ऊपर जाने और अर्थव्यवस्था के कमजोर प्रदर्शन के कारण पिछले पांच वर्षों से बचत में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। ज्यादातर वेतनभोगियों की आय में भी आनुपातिक रूप से वृद्धि नहीं हुई है, जबकि उनकी बचत पर लगातार हमला हो रहा है। खासकर उन लोगों की बचत सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है, जो होम लोन का भुगतान कर रहे हैं, क्योंकि उसकी ब्याज दर काफी ज्यादा है।
जब कोई आदमी कर में छूट हासिल करने के लिए विभिन्न निवेश विकल्पों को खंगालता है, तो खुद को और भी मुश्किलों में पाता है। चूंकि अपने यहां सामाजिक सुरक्षा नहीं है, ऐसे में सरकार को कर में छूट देने वाले लंबी अवधि के निवेश साधनों का विकल्प पेश करना चाहिए था। पर अभी तक शायद ही कोई ऐसी योजना आई है। ईएलएसएस सबसे कम लॉक-इन वाली योजना है, जिसकी अवधि तीन साल की है। जबकि पीपीएफ 15 साल वाली योजना है। एनपीएस की स्थिति को लेकर अभी विवाद है, इसलिए उसमें निवेश नहीं किया जा सकता।
ऐसे में करदाताओं के क्षोभ को समझा जा सकता है। कॉर्पोरेट के पास कर प्रणाली को प्रभावित करने के रास्ते हैं, पर आम आदमी ऐसा नहीं कर सकता। अगर छोटे करदाताओं के पास करों में राहत मांगने का कोई रास्ता नहीं है, तो ज्यादा रकम अदा करने वाले लोगों के पास भी यह जानने का उपाय नहीं है कि सरकार उनके पैसों का कहां इस्तेमाल करती है। क्या उन्हें सरकार के खर्च के बारे में नहीं जानना चाहिए? खासकर तब, जब उन्हें भी अन्य लोगों की तरह बुनियादी वस्तुओं की जरूरत है? यही क्षोभ अनेक लोगों को कर चोरी के लिए उकसाता है-अगर आप एक पैसा भी कर न दो, तो सरकार यह सुनिश्चित जरूर करेगी कि आपको सब कुछ बेहतरीन मिले।
आयकर का आधार वाक्य है कि यह सरकार की आय जरूरतों की व्यवस्था करता है। इसमें यह ध्यान नहीं रखा गया कि करदाताओं की बेहतरी के लिए क्या होना चाहिए। यही कारण है कि हम कर दरों, करों में छूट और कर बचत साधनों में लगातार बदलाव देखते आए हैं। चूंकि सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में बेहतर तो यही होता कि सरकार सभी करदाताओं की जीवन और स्वास्थ्य बीमा को अनिवार्य रूप से उनके टैक्स स्लैब के दायरे में रखकर उनकी आय से जोड़ती। ऐसे में एक ही झटके में सभी व्यक्तियों की जीवन बीमा से जुड़ी जरूरतों का समाधान हो जाता। तब शुरुआती दौर में ही करीब साढ़े तीन करोड़ पॉलिसीधारक तत्काल बीमा के दायरे में आ जाते। आबादी का बड़ा हिस्सा अगर बीमा से जुड़ा होता, तो बीमा की लागत कम होती, जिससे करदाताओं की जेब कुछ कम ढीली होती।
मेरा मानना है कि 90 फीसदी से अधिक करदाताओं की जरूरतें मूलभूत हैं। अपने आश्रितों के भविष्य की वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वे किसी प्रकार की जीवन बीमा चाहते हैं। बीमारी की स्थिति में बेहतर इलाज के लिए उन्हें एक बेहतरीन स्वास्थ्य बीमा योजना की जरूरत होती है और सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी जीविका को ध्यान में रखकर वे पेंशन योजना भी चाहते हैं। अगर सरकार इन जरूरतों को ध्यान में रखकर कर छूट के साधनों पर काम करे, तो इससे न सिर्फ सभी करदाताओं को शानदार सुविधा मिल सकेगी, बल्कि उसका खुद का खजाना भी भरेगा।