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UP Election 2022 : यूपी में क्यों जरूरी हैं ब्राह्मण वोटर्स, पिछले तीन चुनाव में किसका साथ दिया, इस बार क्या माहौल है?

सार

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटर्स की डिमांड बढ़ गई है। चुनाव से ठीक पहले बसपा ने प्रदेश के सभी जिलों में ब्राह्मण सम्मेलन कराया, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने लखनऊ में भगवान परशुराम की मूर्ति का अनावरण किया और भाजपा ने ब्राह्मण वोटर्स को साधने के लिए ब्राह्मण नेताओं की एक कमेटी बना दी है। 
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उत्तरप्रदेश चुनाव 2022 - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सूबे में सबकी नजर ब्राह्मण वोटर्स पर है। राजनीतिक पार्टियां इन वोटर्स को साधने में किसी तरह की कोई कसर छोड़ना नहीं चाहतीं। सभी दलों ने ब्राह्मण वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। ऐसे में सवाल उठता है आखिर ब्राह्मण वोटर्स यूपी की सियासत के लिए क्यों जरूरी हैं? यूपी के अलग-अलग चुनावों में ब्राह्मण वोटर्स ने किसका साथ दिया ? पिछले तीन चुनाव के नतीजे क्या कहते हैं? इस बार चुनाव में ब्राह्मण वोटर्स को रीझाने के लिए पार्टियां क्या-क्या कर रहीं हैं? पढ़िए ये खास रिपोर्ट...
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पहले ये जान लीजिए यूपी में ब्राह्मण वोटर्स क्यों जरूरी है? 
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब 12 फीसदी है। 403 में 60 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां, ब्राह्मण वोटर्स ही निर्णायक की भूमिका में हैं। यहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 20% से भी अधिक है। प्रयागराज समेत चार ऐसे भी विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां ब्राह्मणों की संख्या 40% से भी ज्यादा है। मतलब साफ है, यूपी की सत्ता हासिल करने में ब्राह्मण वोटर्स की अहमियत काफी अहम है।

पिछले तीन चुनाव में क्या हुआ? 

बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : अमर उजाला
शुरुआत 2007 चुनाव से करते हैं। तब बसपा ने 63 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और इनमें 41 ने जीत हासिल की थी। मायावती की सरकार बनी थी। तब उन्होंने नारा दिया था, 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है।'  मायावती का ये बड़ा सियासी दांव था और सफल भी हुआ। दलित और ब्राह्मण वोटर्स का कॉम्बिनेशन बना और सभी ने एक होकर बसपा को वोट दिया। 

2012 में भाजपा ने सबसे ज्यादा 62 ब्राह्मण उम्मीदवारों को उतारा था, जबकि बसपा ने बसपा 58, सपा ने 38 और कांग्रेस ने 52 ब्राह्मण प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। तब ब्राह्मण वोटों का बंटवारा हो गया और समाजवादी पार्टी ने यादव-मुस्लिम का गठजोड़ बनाते हुए सत्ता हासिल कर ली।  

2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा के 312 विधायकों में से 58 ब्राह्मण चुने गए थे। इस वक्त प्रदेश में नौ ब्राह्मण मंत्री हैं। प्रो. दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम बनाया गया। इसके अलावा श्रीकांत शर्मा, ब्रजेश पाठक, जितिन प्रसाद, सतीश चंद्र द्विवेदी, डॉ. नीलकंठ तिवारी, रामनरेश अग्निहोत्री, अनिल शर्मा, आनंद स्वरूप शुक्ला समेत नौ ब्राह्मण मंत्री बनाए गए। 

तीन कारण, क्यों जरूरी हैं ब्राह्मण वोटर्स? 

सपा मुखिया अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला
आठ बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे, 1989 के बाद से ब्राह्मण पीछे हुए
उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे ज्यादा आठ बार ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे हैं। गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, पं. कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी और श्रीपति मिश्र ने ये जिम्मेदारी निभाई। नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे। पांच दिसंबर 1989 को उनके कार्यकाल का आखिरी दिन था और इसके बाद से अब तक कोई भी ब्राह्मण उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बन सका है। तब ये ब्राह्मण केवल वोटबैंक बनकर ही रह गया है। 

तीन कारण, क्यों जरूरी हैं ब्राह्मण वोटर्स? 

1. 12% हिस्सेदारी : राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एमपी सिंह कहते हैं, 'ओबीसी, एससी और मुस्लिम वोटर्स के बाद सबसे ज्यादा ब्राह्मण वोटर्स की संख्या ही है। करीब 12% ब्राह्मण वोटर्स न केवल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, बल्कि चुनावी माहौल बनाने में भी आगे हैं। कई वर्ग ऐसे हैं जो ब्राह्मण वर्ग की सुनते हैं।'

2. छवि बेहतर, कोई कोर पार्टी तय नहीं : ब्राह्मण वोटर्स इसलिए भी अहम है क्योंकि इनकी छवि बेहतर होती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी ब्राह्मणों का अहम योगदान रहा है। वहीं, संख्या ठीक-ठाक होने के बावजूद ब्राह्मणों के लिए कोई खास पार्टी तय नहीं है। जैसे यादव वोटर्स को समाजवादी पार्टी के साथ, दलित वोटर्स को बहुजन समाज पार्टी के साथ जोड़कर देखा जाता है, उस तरह से ब्राह्मण वोटर्स को किसी एक विशेष पार्टी के साथ नहीं जोड़कर देखा जाता है। पहले कांग्रेस में ब्राह्मणों की भूमिका जरूर अहम थी, लेकिन अब नई पीढ़ि के आने के बाद से वह लगभग समाप्त हो चुकी है। 

3. ब्राह्मण के साथ सामान्य के अन्य वर्ग भी साथ आते हैं : ब्राह्मण वोटर्स के साथ सामान्य वर्ग की अन्य जातियों के वोटर्स भी जुड़ते हैं। कायस्थ, भूमिहार, बरनवाल, बनिया, राजपूत समेत अन्य जातियां इसमें शामिल हैं। आमतौर पर ठाकुर और ब्राह्मणों में मतभेद की बात कही जाती है, लेकिन कई मुद्दों पर ब्राह्मण और ठाकुर भी एक हो जाते हैं। ऐसे में किसी पार्टी के साथ ब्राह्मण वोटर्स के जुड़ने से अन्य सामान्य वर्ग की जातियों पर भी प्रभाव पड़ता है। 
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ब्राह्मणों को रीझाने के लिए पार्टियां क्या कर रहीं? 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : अमर उजाला
बसपा : बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने ब्राह्मण वोटर्स को रीझाने की जिम्मेदारी ली है। 75 जिलों में बसपा का ब्राह्मण सम्मेलन हो चुका है। मायावती खुद बोल चुकी हैं कि बसपा की सरकार बनने पर ब्राह्मणों को उचित सम्मान मिलेगा। 

समाजवादी पार्टी : सपा मुखिया अखिलेश यादव का आरोप है कि भाजपा सरकार में सबसे ज्यादा उत्पीड़न ब्राह्मणों का हुआ है। कई ब्राह्मणों का एनकाउंटर हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ठाकुरवाद करने का आरोप लगाते रहे हैं। हाल ही में अखिलेश ने भगवान परशुराम की मूर्ति का अनावरण किया। यह भी एलान किया कि अगर सरकार बनती है तो उत्तर प्रदेश में भगवान परशुराम की सबसे बड़ी मूर्ति बनवाई जाएगी। सपा ने कई ब्राह्मण सभाओं को भी संबोधित किया। 

भाजपा : सत्ताधारी भाजपा में नौ ब्राह्मण मंत्री हैं और 58 ब्राह्मण विधायक हैं। भाजपा ने ब्राह्मण वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए एक टीम का गठन किया है। इसमें कई ब्राह्मण नेताओं और मंत्रियों को शामिल किया है। 
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