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'एक फिल्म की सीख से दर्जनों पीड़ितों की मदद के लिए प्रेरणा मिली'

Tue, 20 Mar 2018 09:26 PM IST
अंजू रावत नेगी
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Advocate Anju Rawat Negi
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उन्नीस बरस पहले की बात है। मैं तब उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल में कानून की पढ़ाई कर रही थी। उस वक्त एक घटना घटी। एक शख्स ने पड़ोस की एक लड़की के साथ कुछ ऐसा किया था, जिसे सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था।

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लेकिन मेरे सामने दिक्कत यह थी कि अपराधी जिस परिवार से ताल्लुक रखता था, मेरे उससे अच्छे संबंध थे। मगर संबंधों का मोह मुझे अपराधी का विरोध करने से नहीं रोक सका। मैंने कई लोगों को अपने साथ लिया और उस शख्स का सामाजिक बहिष्कार किया। नतीजा यह निकला कि न सिर्फ वह, बल्कि उसका पूरा परिवार आज तक दोबारा पौढ़ी गढ़वाल नहीं लौट सका है। उसी दौरान संजय दत्त की फिल्म पिता ने भी मुझ पर गहरा असर डाला।

एक गरीब मजदूर की बेटी के बलात्कार पर आधारित उस फिल्म को मैंने अपने पेशे के काफी करीब पाया। किसी से कहा तो नहीं था, लेकिन मन ही मन मैंने तय किया कि वकालत के दौरान मैं बलात्कार के ऐसे मामलों में गरीबों की हरसंभव मदद करूंगी। एलएलबी पूरी होने के बाद मैंने मेरठ विश्वविद्यालय से एलएलएम किया। शादी के बाद मैं दिल्ली के करीब गुरुग्राम आ गई। यहां मैं किसी पेशेवर वकील की तरह अपना काम करने लगी। लेकिन साथ ही साथ मैं अखबारों की उन खबरों पर लगातार ध्यान देती रही, जो गरीब परिवार की लड़कियों के बलात्कार से जुड़ी होतीं।

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Advocate Anju Rawat Negi
इन्हीं खबरों के आधार पर मैं पीड़ित परिवार से संपर्क करके उनको मुफ्त मदद की पेशकश करती। हालांकि केवल मुफ्त केस लड़ना किसी भी गरीब-मजदूर परिवार के लिए काफी नहीं होता था। कानूनी पचड़े में पड़ने का अर्थ है कोर्ट-कचहरी की भागदौड़, जो कि किसी गरीब मजदूर की दिहाड़ी पर भारी पड़ती है। और उनके लिए इंसाफ पाने से ज्यादा जरूरी जिंदा रहना होता है। इस स्थिति में मैं उनकी अतिरिक्त आर्थिक मदद भी करती हूं।

ऐसे ही एक मामले में मैं एक केस लड़ रही थी। उस केस में गवाह के रूप में मेरी मुलाकात एक पत्रकार श्याम भारती से हुई। श्याम जी की गवाही से मैंने न सिर्फ पीड़िता को न्याय दिलाया, बल्कि उन्हीं की सलाह पर अपने संगठन-फरिश्ते का भी गठन किया, जिसका मकसद था कि एक व्यवस्थित तरीके से गरीब बलात्कार पीड़ित लड़कियों तक कानूनी मदद पहुंचाई जाए। आगे चलकर हमारी संस्था के कार्यक्षेत्र में तेजाब हमले से पीड़ित लड़कियां भी शामिल हो गईं।

एक रिक्शा चालक की छह वर्षीय बच्ची समेत मैंने अपनी संस्था की मदद से अब तक करीब पचास बलात्कार पीड़ित लड़कियों को इंसाफ दिलाया है, जबकि सात मामले अदालत में हैं। इसके अलावा दो ऐसी लड़कियों की मुश्किलें कम करने में मदद की है, जिनकी खूबसूरत जिंदगी पर किन्हीं सिरफिरों ने तेजाब फेंक दिया था। मेरी टीम में कुल तीस सदस्य हैं, जो अपनी कमाई का एक हिस्सा इस नेक काम में लगाते हैं।

हालांकि हम चाहते ही नहीं कि ऐसी किसी भी पीड़ित लड़की को हमारी जरूरत पड़े, मगर किसी भी समाज के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में अपराधियों को सजा दिलाने का काम हम बखूबी कर रहे हैं। पीड़िता को कानूनी न्याय मिल जाने के बावजूद उन्हें कई सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। समाज में उनको आसानी से स्वीकृति नहीं मिलती है। हमारी संस्था ऐसी लड़कियों या महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी काम करती है।
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