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एमपी में 10 अप्रैल को 9 सीटों के मतदान का गणित

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जब देश में तीसरे दौर का मतदान 10 अप्रैल को होगा, तब मध्य प्रदेश की 29 में से 9 सीटों पर लोग अपनी राय इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में कैद कर देंगे।
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कांग्रेस के दिग्गज कमलनाथ, अजय सिंह, प्रसिद्ध वकील विवेक तनखा, रीवा के शेर कहे जाने वाले श्रीनिवास तिवारी के बेटे सुंदरलाल तिवारी, गौंड राजपरिवार की राजनंदिनी सिंह और कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता इंद्रजीत पटेल जैसे नेताओं के राजनीतिक भविष्य का फैसला होगा।

विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इन आठ लोकसभा क्षेत्रों में जबर्दस्त सफलताएं हासिल की हैं। सवाल यह है कि क्या भाजपा यह सफलता लोकसभा में दोहरा पाएगी?

1.रीवा सीट...कांग्रेस-बीजेपी का मुकाबला

ब्राह्मण बहुल रीवा संसदीय क्षेत्र में कभी भाजपा को उम्मीदवार नहीं मिलते थे। कांग्रेस के श्रीनिवास तिवारी का बड़ा दबदबा रहता था। अब श्रीनिवास तिवारी के बेटे सुंदरलाल तिवारी का मुकाबला भाजपा के आठ साल से जिलाध्यक्ष का काम देख रहे जनार्दन मिश्र से है।

सुंदरलाल तिवारी 2009 में बसपा के देवराज सिंह पटेल से केवल 4 हजार मतों के अंतर से हार गए थे। रीवा पूरे विंध्य की सबसे महत्वपूर्ण सीट है।

पिछले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस से ब्राह्मण उम्मीदवार उतरने का यह असर हुआ कि बसपा जीत गई थी। निर्दलीय पुष्पराज सिंह भी एक लाख वोट ले गए थे। इस बार पुष्पराज जिसका समर्थन कर देंगे वह जीत सकता है। इस सीट पर पांच लाख ब्राह्मण मतदाता हैं। नरेंद्र मोदी यहां चार मिनट की छोटी सभा कर चुके हैं।

2.सीधी सीट... मोदी-शिवराज फैक्टर दिला सकता है जीत

भाजपा की नौजवान नेता रीति पाठक का मुकाबला कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता इंद्रजीत पटेल से है। रीति पाठक को कागज पर कमजोर उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन मैदान में वह मजबूत हैं।

वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों के लिहाज से नई हैं। उनसे किसी को कोई नाराजगी नहीं है। वह ठाकुर और दलितों के वोट खींचने में सफल रहती हैं तो भाजपा आसानी से सीट जीत जाएगी।

भाजपा 1998 से लगातार यह सीट जीतती आ रही है। सीधी सीट से टिकट के लिए अजय सिंह लॉबिंग कर रहे थे। उन्हें सतना से टिकट दिया गया है। अजयसिंह समर्थकों का एक वर्ग निराश होकर भाजपा का समर्थन कर सकता है।

मोदी, शिवराज और स्थानीय फैक्टर मिलकर रीति पाठक को जिता सकते हैं। 2009 में भाजपा के जीपी मिश्रा ने कांग्रेस के इंद्रजीत पटेल को 45,740 वोट के बड़े अंतर से हराया था, क्योंकि अर्जुनसिंह की बेटी खड़ी हो गई थीं। अब मिश्रा भाजपा नेतृत्व से नाराज हैं। 

3.सतना सीट

सीधी से टिकट नहीं मिलने के बाद अर्जुनसिंह के पुत्र अजय सिंह सतना से कांग्रेस की जंग लड़ रहे हैं। उनके मुकाबले भाजपा के गणेश सिंह हैं। गणेश सिंह के खनन क्षेत्र में आधिपत्य के बारे में अजय सिंह कहते हैं कि सतना में गणेश सिंह वैसे ही हैं, जैसे बेल्लारी में रेड्डीज बंधु।

गणेश सिंह के खिलाफ दो प्रकरणों में आरोप तय हो चुके हैं। दूसरी तरफ अजय सिंह प्रदेश में तीसरे सबसे अमीर उम्मीदवार हैं। अजय सिंह सीधी के नेता हैं और गणेश सिंह का सवाल यही रहता है कि उन्होंने सीधी में कौन सा विकास कर दिया है।

सतना में सारे रिक्शाचालक सीधी के क्यों हैं, यह बेधक सवाल है गणेश सिंह का। पटेल समुदाय के गणेश सिंह का भाग्य दो लाख ब्राह्मण वोट तय करेंगे। यदि अजय सिंह रीवा में सुंदरलाल तिवारी को ठाकुर मत दिलाएं और सुंदरलाल तिवारी अजय सिंह को सतना में ब्राह्म वोट दिलादें तो दोनों ही जीत सकते हैं।

लेकिन यह महज एक काल्पनिक स्थिति है। 2009 में गणेश सिंह ने बसपा के सुखलाल कुशवाह को केवल 4 हजार मतों से हराया था। ये वही सुखलाल कुशवाहा हैं जिन्होंने एक बार अर्जुनसिंह को हरा दिया था।

4.शहडोल..बीजेपी ने मारी थी पिछली बाजी

जनजाति के लिए सुरक्षित सीट से भाजपा ने गौंड राजपरिवार की राजेशनंदिनी सिंह को मैदान में उतारा है।

उनके मुकाबले कांग्रेस के दलपतसिंह परस्ते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र में ही होता है कि राजपरिवार के पूरे तामझाम के मुकाबले ठेठ समाजवादी नेता रफ-टफ अंदाज में संघर्ष कर रहा है।

भाजपा अपने खेमे में कांग्रेस नेता संजय पाठक को ले आई है। खनन कारोबारी संजय पाठक और राजपरिवार तालमेल शहडोल में गमछाधारी समाजवादी को दृश्य से बाहर कर सकता है।

2009 में कांग्रेस के आरएन सिंह ने भाजपा के नरेंद्र सिंह मरावी को 13 हजार मतों से हराया था।

5.जबलपुर सीट... पिछली हार कांग्रेस की

जब हवा कांग्रेस के खिलाफ बह रही है, शिवराज सिंह से करीबी संबंध रखने वाले वकील विवेक तनखा कांग्रेस के टिकट पर खड़े हो गए हैं।

2009 में भाजपा के राकेश सिंह ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील रामेश्वर नीखरा को एक लाख वोटों से भी ज्यादा अंतर से हराया था।

जबलपुर में भाजपा के राकेश सिंह फिर मुकाबले में हैं। जबलपुर में भाजपा के पास ईश्वरदास रोहाणी भी नहीं हैं और उसके प्रमुख नेता अजय बिश्नोई विधानसभा हार चुके हैं। तनखा मुकाबले में हैं।

6.मंडलाः भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला

मंडला में भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है। भाजपा ने मंडला से चार बार सांसद रहे फग्गनसिंह कुलस्ते को मैदान में उतारा है।

दूसरी तरफ राहुल गांधी के ‘आदिवासी नेतृत्व की संभावना’ ओंकार सिंह मरकाम हैं, जो होने को तो डिंडोरी के विधायक हैं, लेकिन दिल्ली में गहरी पैठ रखते हैं।

राहुल गांधी जब बैगाओं के बीच आए तो ओंकार गोंडी में भाषण देकर दिल्ली तक आ गए। यहां उम्मीदवार का भविष्य गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी भी तय करेगी।

7.बालाघाटः नरेंद्र मोदी का प्रचार तंत्र बेअसर

7.बालाघाटः नरेंद्र मोदी का प्रचार तंत्र यदि कहीं बेअसर दिखाई देता है तो बालाघाट चले जाइए। यहां रहने वाली बड़ी जनसंख्या उस प्रचार तंत्र के सारे औजारों से बाहर है।

फिर भी 2009 में भाजपा के केडी देशमुख ने कांग्रेस के विश्वेश्वर भगत को 40 हजार मतों से हराया था। कांग्रेस ने 29 साल की हिना कावरे को मैदान में उतारा है। हिना, कांग्रेस नेता लखीराम कावरे की बेटी हैं। भाजपा ने उनके मुकाबले बोधसिंह भगत को उतारा है। तीसरा कोण कंकर मुंजारे की पत्नी अनुभा मुंजारे ने पैदा कर दिया है।

शिवराज मंत्रिमंडल के सदस्य गौरीशंकर बिसेन अपनी बेटी के लिए टिकट मांग रहे थे। अब भाजपा पूरी ताकत झोंक रही है। मोदी और शिवराज सभाएं कर चुके हैं।

8.छिंदवाड़ाः कमलनाथ नौ चुनाव लड़े और आठ जीते हैं

8.छिंदवाड़ाः कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ नौ चुनाव लड़े और आठ जीते हैं।

उन्होंने 2009 में भाजपा मारुत राव खावसे को 1.21 लाख वोटों से हराया था। लेकिन विधानसभा चुनावों में इस लोकसभा के तहत आने वाली सात में से चार सीटें भाजपा ने जीती हैं।

संघर्ष कड़ा है। उनके मुकाबले भाजपा ने विधायक चौधरी चंद्रभान सिंह को उतारा है। 
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9. होशंगाबादः दलबदल कर चुके नेता

दोनों ही उम्मीदवार कई बार दलबदल कर चुके हैं। भाजपा ने उदय प्रताप सिंह को उतारा है। जाट नेता उदय प्रताप विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा में आए हैं।

उनके मुकाबले कांग्रेस ने देवेंद्र पटेल को मैदान में उतारा है, जो उदय प्रताप के पुराने मित्र हैं। 2009 में उदय प्रताप जीतने के पहले तक 1989 से 2004 तक के सारे चुनाव भाजपा ने होशंगाबाद से जीते हैं।

उदय प्रताप को अंतिम क्षणों में टिकट देने से भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल थोड़ा कमजोर है। आप की माया विश्वकर्मा भी हैं। भाजपा ने आठों विधानसभा सीटें जीती हैं, इसलिए उदयप्रताप आश्वस्त हैं।
 
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