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Kubereshwardham: तपती धूप में अंगारों के बीच युवा महामंडलेश्वर ने रमाई धूनी,पंडित प्रदीप मिश्रा ने किया सम्मान

Sat, 01 Apr 2023 08:24 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर

सार

कुबेरेश्वरधाम में युवा महामंडलेश्वर सरजूदास ने कहा कि भागवत भूषण पंडित मिश्रा सहित अन्य संत और महंत हमारे धर्म को जागरूक करने का कार्य करते हैं। उनके प्रति कोई भी अप्रिय बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग और साथ देना चाहिए।
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महामंडलेश्वर सरजूदास महात्यागी और कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्यप्रदेश में सीहोर के कुबेरेश्वरधाम में शनिवार को तपती धूप में जलते कंडों के बीच बैठकर महामंडलेश्वर सरजूदास महात्यागी ने धूनी रमाई। उन्हें देखकर यहां पर आए श्रद्धालुओं ने भगवान शंकर का जय घोष किया। सूरजदास महात्यागी ने जिला मुख्यालय के नजदीक चितावलिया हेमा स्थित निर्माणाधीन मुरली मनोहर और कुबेरेश्वर महादेव मंदिर में पहुंचकर कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा से धर्म को लेकर चर्चा की। इस मौके पर युवा मंडलेश्वर के साथ आए उनके शिष्यों का विठलेश सेवा समिति के तत्वाधान में स्वागत और सम्मान किया गया।

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'संतों के प्रति अप्रिय बात नहीं करनी चाहिए'
इस मौके पर उन्होंने कहा कि भागवत भूषण पंडित मिश्रा सहित अन्य संत और महंत हमारे धर्म को जागरूक करने का कार्य करते हैं। उनके प्रति कोई भी अप्रिय बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग और साथ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत का परिचय उसकी सादगी होती है, जिस तरह से उन्होंने हमारा सम्मान किया है। उससे हम उनके संस्कारों और संस्कृति को प्रणाम करते हैं। संतों का जीवन निर्मल जल के समान होता है। संतों के उपदेश सदैव प्रेरणादायी होते हैं, जिन्हें आत्मसात कर व्यक्ति को अपना जीवन लोक कल्याण के कार्य में समर्पित करना चाहिए। महापुरुषों ने सदैव समाज का मार्गदर्शन कर मानव कल्याण के लिए प्रेरित करने का काम किया है।

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सिर पर खप्पर जलाकर की तपस्या
समिति के मीडिया प्रभारी प्रियांशु दीक्षित ने बताया कि शनिवार को कामदा एकादशी के अवसर पर पंडित प्रदीप मिश्रा के सानिध्य में विशेष पूजा अर्चना की गई थी। वहीं, दोपहर को युवा महामंडलेश्वर ने अपने चारों तरफ आग का घेरा बनाकर अपने सिर पर खप्पर जलाकर सभी के कल्याण के लिए तपस्या की।

श्री-श्री 108 अखिल भारतीय महामंडलेश्वर सरजूदास महात्यागी ने बताया कि वह करीब 16 सालों से कठिन तपस्या कर रहे हैं। उनको मात्र 22 साल की अवधि में महामंडलेश्वर की उपधि प्राप्त हो गई थी, वह राजस्थान के बीकानेर के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि 18 साल का समय छह चरण में पूरा होता है। पहले चरण को पंच धूनी कहते हैं। यह तीन साल का होता है। बसंत पंचमी के दिन से इसकी शुरुआत होती है। डेढ़ से तीन घंटे तक संत तपस्या में लीन रहते हैं। पंच धुनी में चार जगह पर आग जलाते हैं। पांचवें स्थान को सूर्य देव मानते हैं। यह चरण पूरा करने के बाद सप्त धूनी होती है। इसे पूरा करने में भी तीन साल लगते हैं। इसके संत छह जगहों पर आग जलाते हैं।
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उन्होंने बताया कि सातवां सूर्य देव की गर्मी लेते हैं। तीसरा चरण द्वादश और चौथा चौरासी धूनी होता है। यह भी तीन-तीन साल चलता है। इसमें संत आग का गोला बनाकर तपस्या करते हैं, जिसे कोठ या खप्पर बोलते हैं। जिसमें संत अपने सिर पर खप्पर जलाकर तपस्या करते हैं।

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