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Sehore: अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के शहादत दिवस पर जिला प्रशासन ने दिया गार्ड ऑफ ऑनर

Sun, 24 Jul 2022 10:02 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर

सार

अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के शहादत दिवस पर जिला प्रशासन द्वारा शहर के इन्दौर नाका स्थित कुंवर चैन सिंह की छतरी पर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके साथ ही नागरिकों द्वारा श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।
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अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के शहादत दिवस पर मौजूद पुलिसकर्मी। - फोटो : सोशल मीडिया
अमर शहीद कुंवर चैन सिंह के शहादत दिवस पर जिला प्रशासन द्वारा शहर के इन्दौर नाका स्थित कुंवर चैन सिंह की छतरी पर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके साथ ही नागरिकों द्वारा श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।

उल्लेखनीय है कि 1857 की क्रांति के पहले की नरसिंहगढ़ रियासत के कुंवर चैन सिंह अपने दो साथी हिम्मत खां और बहादुर खां के साथ अंग्रेजी सेना से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का आगाज किया था।

देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति 1857 में प्रारंभ हुई और देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाई गयी। कई जगहों पर वीर सपूतों ने अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए प्राणों का बलिदान दिया। इस क्रांति के नायक शहीद मंगल पाण्डे को माना जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश में मेरठ क्रांति के 33 साल पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ जंग का आगाज हो चुका था। मालवा अंचल में अनेक वीरों ने अंग्रेजी सेना से बगावत कर युद्ध लड़ा और अपने प्राणों का बलिदान किया। स्वतंत्रता के इतिहास में सीहोर जिले की अन्य घटनाओं के साथ ही अमर शहीद कुंवर चैन सिंह की शहादत भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। 
 
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शहीद कुंवर चैन सिंह की छतरी। - फोटो : अमर उजाला
1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल के तत्कालीन नवाब के बीच हुए समझौते के बाद कंपनी ने सीहोर में एक हजार सैनिकों की छावनी बनाई। कंपनी द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को इस फौजी टुकड़ी की कमान सौंपी गई। समझौते के तहत मैडॉक को भोपाल सहित नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ रियासत से संबंधित राजनीतिक अधिकार दिए गए। इस फैसले को नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज अमर शहीद कुंवर चैन सिंह ने गुलामी की निशानी मानते हुए स्वीकार नहीं किया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों के वफादार दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा को मार दिया। इन दोनों की हत्या के अभियोग से बचने के लिए अंग्रेजो ने कुछ शर्तें रखी जिसे कुंवर चैन सिंह ने ठुकरा दिया।

अमर शहीद कुंवर चैन सिंह 24 जुलाई 1824 की दोपहर अपने घोड़े पर बैठकर कैम्प से बाहर जाने लगे तब अंग्रेजों के कर्मचारियों ने उन्हें यह कहते हुए रोका दिया कि आपको कैम्प से बाहर जाने की इजाजत नहीं है। इससे कुंवर चैन सिंह का स्वाभिमान आहत हुआ। उन्हें ब्रिटिश हुकुमत की गुलामी कतई स्वीकार नहीं थी। वे मेडॉक और जॉनसन के आदेश की अवहेलना कर कैम्प से बाहर चले गये। मना करने के बाद भी कुंवर चैन सिंह के बाहर चले जाने से युद्ध की आशंका के चलते मैडॉक ने सेना को बुलवाने का प्रबंध किया और यह सेना डबरी की छावनी, सीहोर की छावनी, भोपाल तथा होशंगाबाद से बुलवाई थी। लगभग 5 से 6 हजार सैनिक सीहोर पहुंच चुके थे।
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कुंवर चैन सिंह अंग्रेजों से लड़ते हुए 24 साल की उम्र में शहीद हो गए थे। - फोटो : सोशल मीडिया
अंग्रेजी सेना ने 24 जुलाई 1824 की रात्रि में कुंवर चैन सिंह के कैम्प को घेर लिया और अंग्रेजी फौज द्वारा आक्रमण कर दिया गया। कुंवर चैन सिंह अपने विश्वस्त साथी हिम्मत खां और बहादुर खां सहित 43 सैनिकों के साथ अंग्रेजी फौज का वीरतापूर्वक सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का आगाज किया।

 
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