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जीते जरूर मगर मंथन शुरू: पूर्व मुख्यमंत्री की सीट पर घटी भाजपा की लीड...चिंता बढ़ी तो समीक्षा में जुटी पार्टी

Wed, 03 Nov 2021 03:59 PM IST
रवींद्र भजनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देवास

सार

खंडवा लोकसभा में भाजपा प्रत्याशी ज्ञानेश्वर पाटिल लगभग 82 हजार वोटों से जीतकर सांसद बने हैं। अब भाजपा यह देख रही है कि किन इलाकों में उसका परफॉर्मंस कमजोर रहा, ताकि वहां स्थिति में सुधार किया जा सके।  
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खंडवा के नए सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उपचुनाव के नतीजे के बाद भाजपा-कांग्रेस में मंथन का दौर चल रहा है। कांग्रेस आशानुरूप परिणाम न आने के कारण दुखी है तो भाजपा खुश है लेकिन मंथन भी कर रही है। खंडवा लोकसभा के परिणाम के बाद भाजपा यह सोचने पर मजबूर हो गई है कि आखिर वोट प्रतिशत क्यों घटा। लीड कम कैसे हुई क्योंकि राजनीतिक जानकार इस परिणाम को आगामी चुनावों के लिए खतरे की घंटी बता रहे हैं।
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खंडवा लोकसभा में भाजपा प्रत्याशी ज्ञानेश्वर पाटिल लगभग 82 हजार वोटों से जीतकर सांसद बने हैं। भाजपा प्रत्याशी को 6 लाख 32 हजार 455 वोट मिले जो पिछले चुनाव से करीब दो लाख कम हैं। इसी तरह कांग्रेस प्रत्याशी राजनारायण सिंह को लगभग साढ़े पांच लाख वोट मिले। पिछले चुनाव से कांग्रेस 15 हजार वोट कम लाई। प्रतिशत के लिहाज से देखें तो भाजपा को 49.85 प्रतिशत व कांग्रेस को 43.38 प्रतिशत वोट मिले। 

करीब 32 हजार वोट कम मिले
अब बात करतें हैं उन जगहों की जहां से भाजपा को निराशा मिली। देवास जिले की बागली विधानसभा ने भाजपा को सबक दिया है। पिछले चुनाव में भाजपा को इस विधानसभा सीट से करीब 43 हजार मतों की लीड मिली थी जो इस बार घटकर 12 हजार से भी कम रही। बड़ी बात यह है कि बागली सीट मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी की परंपरागत सीट रही है। इसी सीट से जीतकर वे मप्र के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे। उनके बेटे दीपक जोशी भी  यहां से चुनाव जीते थे। बाद में सीट अजजा वर्ग के लिए आरक्षित हो गई। चंपालाल देवड़ा विधायक रहे। अब डीएसपी का पद छोडक़र राजनीति में आए पहाड़सिंह कन्नौजे यहां से विधायक हैं।
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बागली में उठे थे विरोध के स्वर
बागली सीट पर चुनाव के पहले से ही विरोध शुरू हो गया था। सीएम की घोषणा के बावजूद बागली को जिला नहीं बनाया गया तो सिंचाई परियोजना को लेकर भी नाराजगी सामने आई। ग्रामीणों ने कई गांवों में पोस्टर लगाकर नेताओं का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। नेताओं की सभा में गांववाले नहीं जा रहे थे। भाजपा की नींद उड़ी हुई थी कि आखिर कैसे मनाया जाए। लगातार बैठकें ली और आश्वासन दिया। इसके बाद लोग मान तो गए लेकिन नाराजगी खत्म नहीं हुई। यही वजह रही कि इस चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहा। नाराजगी के चलते लोग वोट डालने नहीं पहुंचे। भाजपा पदाधिकारी अब यह कहकर बच रहे हैं कि पिछले चुनाव में मतदान ज्यादा था और इस बार कम रहा। भाजपा के वोटर वोट डालने नहीं पहुंचे, इसलिए लीड कम रही लेकिन दबीजुबान ये स्वीकार कर रहे हैं कि कहीं न कहीं चूक जरूर हुई है।

विधायक के प्रति नाराजगी का असर
विधायक पहाड़सिंह कन्नौजे की कार्यशैली से भी लोग नाराज हैं, इसका असर चुनाव नतीजों में साफ दिख रहा है। संगठन के पास कई बार इस तरह की बात पहुंची मगर संगठन ने भी इसलिए गंभीरता नहीं दिखाई क्योंकि बागली भाजपा का गढ़ रहा है और केंद्र-राज्य में भाजपा सरकार है। अब जब नतीजे आए हैं तो भाजपा की नींद उड़ गई है। खंडवा संसदीय सीट में बागली ही ऐसी सीट रही है जहां लीड बहुत कम रही है। आंख बंद करके खर्च करने के बावजूद हालात नहीं सुधरे। अब संगठन इस पर मंथन कर रहा है। बूथवार समीक्षा की जा रही है कि कहां कमजोर रहे और क्या कारण रहे। पदाधिकारी भी दबीजुबान कह रहे हैं कि ये नतीजे भविष्य के खतरे के संकेत दे रहे हैं।

भीकनगांव और मांधाता में भी भाजपा कमजोर रही
बागली के अलावा भीकनगांव और मांधाता में भी भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा। इन दोनोंं जगहों पर कांग्रेस की लीड रही। हालांकि शेष विधानसभाओं में जरूर भाजपा को ज्यादा वोट मिले लेकिन कांग्रेस नजदीक ही रही। यही कारण रही कि पिछले चुनाव में बंपर जीत हुई थी वह इस बार एक लाख के अंदर सिमट गई। भाजपा इसलिए मंथन के दौर में है कि 2023 और 2024 के चुनावों से पहले स्थिति सुधारी जाए।
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