आलीराजपुर जिले के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में दिवासा पर्व उत्साह से मनाया गया। ग्राम देवता की पूजा, मांदल-ढोल की थाप पर लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय व्यंजनों के साथ ग्रामीणों ने अच्छी बारिश, भरपूर फसल, सुख-समृद्धि और सामाजिक एकता की कामना की।
आलीराजपुर जिले के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में इन दिनों पारंपरिक दिवासा पर्व की धूम देखने को मिल रही है। नानपुर सहित आसपास के गांवों में आदिवासी समाज के लोग आस्था, उल्लास और अपनी समृद्ध लोक संस्कृति के साथ यह पर्व मना रहे हैं। बारिश के मौसम में चारों ओर फैली हरियाली और खेतों में लहलहाती फसलों के बीच गांवों का माहौल लोकगीतों, मांदल और ढोल की थाप से गूंज रहा है।
ग्राम देवता की पूजा कर मांगी खुशहाली
मांदल की थाप पर लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा बनी आकर्षण
पर्व के दौरान पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा पहनकर आयोजनों में शामिल होते हैं। मांदल, ढोल और बांसुरी की धुन पर युवक-युवतियां सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं, जिससे गांवों का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है।
घरों में बनते हैं पारंपरिक पकवान
दिवासा पर्व पर घरों में विशेष पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। बेसन और विभिन्न दालों से तैयार बड़े, ताये, भजिए सहित कई स्थानीय पकवान इस अवसर पर बनाए जाते हैं। रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों के घर जाकर शुभकामनाएं देने तथा साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने की परंपरा भी इस पर्व को विशेष बनाती है।
अलग-अलग गांवों में अलग दिन मनाने की परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार दिवासा पर्व की तिथि गांव के वरिष्ठजन, पटेल और तड़वी की सहमति से तय की जाती है। खास बात यह है कि जिले के अलग-अलग गांवों में यह पर्व अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। इसके पीछे सामाजिक परंपरा यह है कि कई परिवारों और रिश्तेदारों के सदस्य अलग-अलग गांवों में रहते हैं। अलग-अलग तिथियों पर पर्व होने से वे सभी गांवों के आयोजनों में शामिल हो पाते हैं।
नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ रहा पर्व