सूखे और तंगहाली के चलते विदर्भ और बुंदेलखंड में एक के बाद एक किसानों की आत्महत्याओं की खबर तो आपने सुनी होंगी लेकिन इन सबसे इतर मध्यप्रदेश के एक गांव से आ रही खबर आपको झकझोर देगी। राज्य के खरगौन जिले का एक गांव आत्महत्या करने वालों का गांव बनता जा रहा है। बर्बादी का आलम ये है कि पिछले तीन महीने में 80 से ज्यादा लोग इस गांव में अपनी जान दे चुके हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसाार जिले के बादी गांव के राजेन्द्र सिसौदिया कुछ दिन पहले ही यहां के सरपंच बने हैं। अपने घर के चबूतरे पर बैठे राजेन्द्र के चेहरे पर यूं तो बड़ी जिम्मेदारी मिलने की खुशी होनी चाहिए थी लेकिन उनकी लाल आंखें और उतरा हुआ चेहरा कुछ और ही कहानी बंया कर रहा है।
सिसौदिया तब गांव के सरपंच बने जब दो महीने पहले गांव के निर्वाचित प्रधान और उनके चचेरे भाई जीवन ने अपने घर में लगे एक पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली। उनके मां और भाई भी पूर्व में इसी तरह जान देकर अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं।
गंभीर वित्तीय संकट, लगातार अवसाद और घोर अंधविश्वास में घिरकर बादी गांव के लोग एक एक कर अपनी जान दे रहे हैं। देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में से एक खरगौन में पिछले साल 381 से ज्यादा लोग आत्महत्या कर चुके हैं।
गांव में कोई घर ऐसा नहीं है जहां किसी ने न की हो खुदकुशी
जिले के बादी गांव पर तो मनहूसियत का साया इस कदर है कि करीब ढाई हजार की आबादी वाले इस गांव में पिछले दो दशक में 350 से ज्यादा लोग खुदकुशी कर चुके हैं। इस साल यह मनहूस आंकड़ा तेजी से बढ़ा है और शुरूआती तीन महीनों में ही 80 लोग मौत को गले लगा चुके हैं।
खारगौन के एसपी अमित सिंह बताते हैं कि बादी गांव का हर घर आत्महत्या का दंश झेल चुका है। गांव के सरपंच राजेन्द्र सिसौदिया बताते हैं कि हमारे गांव में 320 परिवार हैं, और हर घर से एक व्यक्ति आत्महत्या कर अपनी जान दे चुका है।
गांव के मुखिया राजेन्द्र इन मौतों के पीछे गांव में किसी राक्षसी की उपस्थिति को बताते हैं। लेकिन क्षेत्र के मनोचिकित्सक इसके पीछे कुछ और ही तर्क देते हैं। इंदौर निवासी मनोचिकित्सक डा. श्रीकांत रेड्डी ने बताया कि खुदकुशी की घटनाएं अवसाद और ग्रामीणों के एक अजीब पागलपन की वजह से बढ़ रही हैं। इसके पीछे एक कारण खेती में कीटनाशकों का प्रयोग भी हो सकता है।
डा. रेड्डी बताते हैं कुछ लोगों में तो आसानी से अवसाद की पहचान करना भी मुश्किल है, और जब वह इसके पीछे कोई कारण नहीं खोज पाते तो इसे राक्षसी उपस्थिति बताने लगते हैं। वो मानते हैं कि यह मामला इस कदर गंभीर हो गया है कि प्रशासन को तुरंत इसका संज्ञान लेना चाहिए।
मनोचिकित्सकों के अनुसर वित्तीय समस्याओं से टूट रहे किसान
किसान
- फोटो : अमर उजाला
डा. रेड्डी के अनुसार वित्तीय समस्याओं के अलावा भी आत्महत्या के कई कारण हो सकते हैं। वह इस संबंध में कुछ साल पहले चीन में हुए एक शोध का हवाला देते हैं। जहां एक क्षेत्र में कुछ समय में ही किसानों के आत्महत्या करने की कई घटनाएं सामने आईं।
जब इसकी जांच की गई तो पता चला कि खेतों में कीटनाशकों का अत्याधिक इस्तेमाल करने के कारण उनके शरीर के कई अंग दिक्कत करने लगे थे। इसी तरह बादी में लगातार हो रही आत्महत्याओं की भी विस्तृत जांच होनी चाहिए।
वहीं खारगौन जिले के ज्यादातर किसान नकद फसलों की ही खेती करते हैं, जैसे कॉटन आदि और इसमें अच्छे परिणाम नहीं मिलने पर वित्तीय समस्याएं आने लगती हैं जिससे वह टूट जाते हैं। कुछ कुछ ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र के विदर्भ में भी है। लगातार हो रही इन मौतों पर खारगौन के कलेक्टर अशोक वर्मा ने जांच के लिए एक कमेटी का गठन कर दिया है।