फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मध्यप्रदेश के इस चुनावी युद्ध में शिवराज ही जीतेंगे, शिवराज ही हारेंगे

Wed, 28 Nov 2018 07:10 PM IST
जयदीप कर्णिक
विज्ञापन
शिवराज से हार जाएंगे शिवराज? - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

मध्यप्रदेश के मतदाताओं का फैसला अब ईवीएम मशीनों में बंद हो गया है। इन चुनावों का परिणाम जो भी हो, पूरे प्रचार में सतह पर कुछ भी दिखाई दिया हो, कांग्रेस भले इस बार मजबूती से मैदान पकड़ती नजर आई हो, दोनों ओर के सितारा प्रचारकों ने जमीन-आसमान एक कर दिया हो पर सतह के नीचे ये लड़ाई केवल शिवराज बनाम शिवराज की ही थी। इस लड़ाई में या तो शिवराज जीतेंगे या शिवराज  हारेंगे। ना तो कांग्रेस भाजपा से लड़ी है और ना ही भाजपा के तमाम क्षत्रप एक हो गए पार्टी के लिए| सब अपने विधायक अपनी, जमीन बचाने में लगे रहे।

ये मोदी बनाम राहुल नहीं

कांग्रेस के खाते में ये उपलब्धि जरूर है कि वो दिखाने के लिए ही सही दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया के तीव्र अंतरविरोध की धाराओं को साथ रख पाई। ये धैर्य संभावित जीत में हिस्सेदारी और अपना खेल जमाए रखने तक ही  सीमित है। मध्यप्रदेश के 2018 के विधानसभा चुनावों की एक बड़ी खासियत ये भी है कि 2014 के अन्य विधानसभा चुनावों की तरह यहां सीधा मोदी बनाम राहुल नहीं हो पाया। भाजपा के प्रवक्ता सफाई देते रहे कि ऐसा पांच राज्यों में चुनाव होने और मोदी की व्यस्तता के चलते हुआ, लेकिन सच यही है कि मोदी को जब भी सीधी लड़ाई लड़नी हो, वो लड़ते हैं। अमित शाह जरूर अपनी रणनीति और दमखम के साथ मध्यप्रदेश के मैदान में डटे हुए दिखाई दिए। पर उन्हें भी शुरुआती दौर में संगठन की पूरी ताकत झोंक देने के बाद समझ में आ गया कि यहां अब शिवराज के बिना नहीं चल पाएगा। 

शिवराज, जो हर जगह मौजूद रहे

अपने पिछले 13 साल के कार्यकाल में शिवराज जिस तरीके से वन मैन शो चलाते रहे उसे अब चुनाव के 20-25 दिनों में एकदम उलट देना संभव नहीं है| सीमा पर मध्यप्रदेश का कोई सैनिक शहीद हो जाए तो शिवराज उसकी शवयात्रा में कांधा देते हुए सबसे आगे दिखाई देंगे। किसी विधायक के यहाँ खुशी या गम हो तो शिवराज, किसान आंदोलन हो तो शिवराज, कलेक्टर-कमिशनर बदलने हों तो शिवराज, लाड़ली-लक्ष्मी हो तो शिवराज, तीर्थ-दर्शन हो तो शिवराज, भावंतर हो तो शिवराज.....मध्यप्रदेश के टोले-मजरे से लेकर श्यामला हिल्स की पहाड़ियों तक हर जगह शिवराज ने अपनी छाप को इतना मजबूत और दूसरे पहचान चिन्हों को इतना धूमिल कर दिया था कि वल्लभ भवन में लगा हर आइना भी शिवराज की ही शक्ल दिखाने लगा था।

कांग्रेस के पास तो 2013 में भी था मौका

यही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सबसे बड़ी ताकत भी रही और कमजोरी भी। कांग्रेस ने अगर ऐन चुनाव के वक्त इन कमजोरियों में सेंध लगाने कि कोशिश भी की तो कौन सा तीर मार लिया? इतना ही मजबूत मौका कांग्रेस के पास 2013 में भी था। तब व्यापम और डम्पर भी चरम पर थे। अगर संगठन अपने पैरों पर खड़ा होता और कांग्रेस ये तय कर पाती कि तीनों नेताओं की लड़ाई में किसे बागडोर सौंपनी है तो आज कांग्रेस शिवराज की कमजोरी की बजाय अपने दम पर जीत के सपने देख रही होती।

विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन

कैब ड्राइवर की बात ध्यान से सुनें!

शिवराज सिंह चौहान-अमित शाह

सत्ता विरोध की तमाम लहर के बीच भी आज शिवराज के पास संघ और संगठन की ताकत भी मौजूद है। भीतरी कलह भुला कर वो चुनाव में तो हाथ बंटा ही देते हैं, वहीं कांग्रेस के सेवादल, युवा कांग्रेस, भाराछासं और महिला कांग्रेस जो कभी पार्टी की रीढ़ तैयार करते थे उनमें वो संगठनात्मक ऊर्जा और परिवर्तन की चाह क्यों नजर नहीं आती? जैसा कि मुझे हाल ही में अमर उजाला संवाद के लिए भोपाल यात्रा के दौरान एक कैब चालक ने कहा – सर जी ये कांग्रेस वाले चुनाव के टाइम पे जितनी मेहनत करते हैं और घर से निकलते हैं उस से आधा भी अगर पांच साल तक सक्रिय रहें तो इनको हराना मुश्किल हो जाए!! जब एक कैब चालक को ये बात समझ आती है तो जाहिर है पार्टी के दिग्गज नेताओं को तो आती ही होगी!!

याद रहेंगे ये दिलचस्प चुनाव

हो सकता है कांग्रेस अपने इस बार के जबर्दस्त जीत के दावे को लेकर सफल हो जाए पर उसे अपने आप से जीतने के यत्न तो फिर भी करने ही होंगे। बहरहाल, इस बार मध्यप्रदेश में चुनाव बहुत ही दिलचस्प हुए। बसपा शुरुआत
में ही दौड़ से बाहर हो गई। सपा अपने गृह राज्य में ही झमेलों से निपट नहीं पा रही, अन्यथा ये चुनाव कुछ पैर जमाने का बेहतर मौका हो सकते थे। सपाक्स 109 उम्मीदवारों के साथ एक बड़ा कारक जरूर है। वो खुद कितनी भी सीटें
जीते, कइयों को हराने का कारण जरूर बन सकती है। जयस भी एक बड़ा कारक हो सकता था पर कांग्रेस की रणनीति उसकी हवा निकालने में कामयाब रही। अलावा को टिकट देने के अलावा कांग्रेस की एक बड़ी कामयाबी किसानों के असंतोष की नब्ज पकड़ने की रही। कर्ज माफी का गुब्बारा शिवराज को ले उड़ेगा या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, पर हां ग्रामीण अंचलों में उड़ रही धूल में इसकी गंध मौजूद है।

भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार अमित शाह ने भी शुरू में संगठन को आगे रखने की बात कही और फिर शिवराज को ही आगे हो जाने दिया। बदलाव की आहट को भांपते हुए संघ ने भी आखिरी क्षणों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उधर कांग्रेस ने बदलाव की बयार को तेज करने में हर स्तर पर अपनी ताकत लगा दी। इस पूरे चुनाव में जुबानी तीर भी खूब चले। मां–पिता से लेकर गोत्र तक की चर्चा हुई।

मतदान के प्रतिशत और मुद्दों का फेर 

मतदान 74.61 फीसदी हुआ| 2013 में 72.18 प्रतिशत मतदान हुआ था| 11 जिलों में पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार 3 फीसदी ज्यादा मतदान हुआ। इन 11 जिलों में 47 विधानसभा सीटें हैं। इन 47 सीटों में से पिछली बार भाजपा के पास 37 सीटें और कांग्रेस के पास 9 सीटें थीं।  मतदान के प्रतिशत को लेकर भी अलग-अलग आकलन और कयास हैं| एक सीधा अनुमान तो ये है कि सत्ता विरोधी लहर के चलते लोग घरों से निकाल कर आए हैं| पर अगर प्रतिशत की बजाय आंकड़ें देखें तो लगभग जीतने नए मतदाता जुड़े उयतना ही इजाफा 2013 के मुक़ाबले वोट प्रतिशत में हुआ है| एक अनुमान ये है कि आखरी समय में संघ अपने वोटरों को बाहर निकालने में कामयाब रहा है| वहीं मुस्लिम बहुल इलाके में भी तागड़ा मतदान हुआ है| सूचनाएँ ये भी हैं कि मोदी-भाजपा के खिलाफ तगड़ी लामबंदी हुई है| ये सब कयास और सूचनाएँ हैं| बात तो नोटबंदी और जीएसटी की भी है| नोटबंदी, जीएसटी और किसान की त्रिवेणी भारी है या ज्योति-कमल-दिग्गी के दांव, ये भी चंद रोज़ में पता चल ही जाएगा, पर इन सबसे ऊपर और परे – शिवराज बनाम शिवराज तो है और रहेगा|


ये तो खैर 11 तारीख को ही पता चलेगा की आज ईवीएम में क्या दर्ज हुआ है और शिवराज एक अकेले योध्दा साबित हुए हैं या फिर 13 साल बाद खुद अकेले पड़ गए हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें