हत्या के एक आपराधिक प्रकरण की सुनवाई करने वाली ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में उपलब्ध एफएसएल रिपोर्ट के खिलाफ अपने आदेश में गलत निष्कर्ष का उल्लेख किया। अपील की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की युगलपीठ, जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस ए.के. सिंह ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से और सावधानीपूर्वक निभाने में नाकाम रही है। युगलपीठ ने आजीवन कारावास की सजा को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को दोषमुक्त कर दिया। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि संवेदनशील मामलों को संभालने के लिए संबंधित ट्रायल कोर्ट के पीठासीन अधिकारी के आदेश को मूल्यांकन के लिए हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि वे मामले में उचित निर्णय ले सकें।
हाईकोर्ट में अपील की गई थी दायर
अपीलकर्ता लोटन लोधी की ओर से दमोह जिला न्यायालय के विशेष न्यायाधीश उदय सिंह मरावी द्वारा 31 अक्टूबर 2025 को हत्या के अपराध में दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा से दंडित किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। अपील में कहा गया था कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। तीन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उसे सजा से दंडित किया गया था। तीनों परिस्थितियों की कड़ी आपस में मेल नहीं खाती है।
मुख्य गवाह के बयान और मेमोरेंडम में मिला विरोधाभास
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि मुख्य गवाह छोटेलाल अहिरवार का कहना था कि मुन्ना अहिरवार उसके चाचा थे। चाचा और अपीलकर्ता 22 मार्च 2024 को घर के चबूतरे पर बैठे थे। चाचा ने उसे 100 रुपये दिए और शराब लाने को कहा। गवाह दुकान बंद होने के कारण बिना शराब लिए वापस लौट आया और रुपये वापस चाचा को लौटा दिए थे। इसके बाद चाचा और अपीलकर्ता साथ में चले गए थे। वह भी घर जाकर खाना खाकर सो गया था। अगले दिन उसे पता चला कि उसके चाचा लखन सिंह के दरवाजे पर मृत पड़े हुए हैं। मुख्य गवाह के बयान अपीलकर्ता के मेमोरेंडम के विपरीत पाए गए। अपीलकर्ता के अनुसार, छोटेलाल अहिरवार ने हल्ले की दुकान से शराब की दो क्वार्टर खरीदी थीं। धारा 161 के तहत बयान घटना के 13 दिन बाद दर्ज किए गए थे। अभियोजन पक्ष ने इस देरी का कोई कारण नहीं बताया है।
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बरामद मोबाइल और कॉल डिटेल्स पर भी उठे सवाल
पुलिस के अनुसार, अपीलकर्ता के घर से 100-100 रुपये के तीन नोट तथा पांच हजार रुपये का एक मोबाइल हैंडसेट बरामद किया गया था। परिजनों द्वारा मोबाइल सेट के मृतक का होने का दावा नहीं किया गया। कंज्यूमर एप्लीकेशन फॉर्म में मोबाइल हैंडसेट में सिम नंबर या सिम कार्ड न होने के बारे में कोई जिक्र नहीं है। उसमें आईएमईआई नंबर का जिक्र नहीं था, बल्कि सिर्फ सिम नंबर का उल्लेख था। वह सिम भी मुन्ना अहिरवार के बेटे के पास से जब्त किया गया था। कॉल डिटेल्स की बात है तो यह सही है कि दोनों ने एक-दूसरे को कॉल किए थे, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि जब्त किए गए हैंडसेट से दोनों के बीच बातचीत हुई थी या बरामद सिम का इस्तेमाल किया गया था।
एफएसएल रिपोर्ट के उलट दर्ज किया गया निष्कर्ष
इसके अलावा, एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार अपीलकर्ता के पास से जब्त की गई चीजों में इंसानी खून नहीं पाया गया था। मृतक के कपड़ों में इंसानी खून पाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से दर्ज किया कि अपीलकर्ता से जब्त की गई चीजों पर इंसानी खून मिला था। युगलपीठ ने कहा कि यह निष्कर्ष गलत है और एफएसएल रिपोर्ट के खिलाफ है। ट्रायल कोर्ट द्वारा ऐसी बात दर्ज की गई, जो रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थी। युगलपीठ ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपीलकर्ता को दी गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त करते हुए उक्त आदेश जारी किए।