मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को बहाल करने की राज्य सरकार की कोशिशों को सर्वोच्च न्यायालय में शुरुआती झटका लगा है। उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध दायर राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 10 तकनीकी त्रुटियां निकाली हैं। इन आपत्तियों को दूर किए बिना याचिका पर नियमित सुनवाई शुरू नहीं हो सकेगी। इसके साथ ही सरकार के फैसले के विरोध में तीन कैविएट भी दायर की गई हैं ताकि अदालत कोई भी अंतरिम आदेश देने से पहले विपक्षी पक्षों की बात सुने।
याचिका की प्रमुख तकनीकी त्रुटियां
राज्य सरकार ने जबलपुर उच्च न्यायालय के 9 अक्तूबर के निर्णय को चुनौती देने के लिए 16 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस याचिका को दर्ज करते हुए कोर्ट रजिस्ट्री ने समीक्षा के बाद इस पर आपत्तियां दर्ज कराईं। कमियों के कारण याचिका को अब तक नियमित नंबर जारी नहीं हो पाया है। रजिस्ट्री ने याचिका के आवरण पृष्ठ, अनुक्रमणिका और संलग्न दस्तावेज की तारीखों में असमानता पाई है।
इसके अतिरिक्त पृष्ठ संख्या 1 से 11, 13 और 392-393 पर प्रस्तुत दस्तावेज स्पष्ट न होने के कारण उनकी साफ तथा टाइप की हुई प्रतियां जमा करने का निर्देश दिया है। बहुरंगी चार्ट और सूचना से जुड़े पन्नों की चार अलग-अलग प्रतियां भी मांगी गई हैं। वकालतनामे में प्रमाणीकरण संबंधी आवश्यक उल्लेख छूट गए हैं और दूसरे याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर भी दर्ज नहीं हैं। राहत वाले भाग से अतिरिक्त विवरण हटाने को भी कहा गया है।
विरोध में तीन कैविएट याचिकाएं दाखिल
अदालत में राज्य सरकार की याचिका सूचीबद्ध होने से पहले ही तीन कैविएट याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। यह कैविएट 13 से 26 अक्तूबर के मध्य यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन, सत्यम नंदन और रितु बड़ोले की ओर से दाखिल की गईं। कैविएटकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगनादेश अथवा कोई अन्य निर्देश देने से पूर्व उनका पक्ष अनिवार्य रूप से सुना जाए।
यह स्थिति तब बनी है जब राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रभावी पैरवी के लिए विधि विभाग के माध्यम से सात अतिरिक्त महाधिवक्ता और चार उप महाधिवक्ता तैनात किए हैं। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित अनेक वरिष्ठ अधिवक्ता भी इस कानूनी प्रक्रिया का संचालन कर रहे हैं।
ये भी पढ़ें: बुरहानपुर में चौंकाने वाला मामला: बहादरपुर के श्मशान घाट से दो मृतकों की अस्थियां गायब, परिजनों में आक्रोश
उच्च न्यायालय के निर्णय का मुख्य आधार
जबलपुर उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ शामिल थे, ने 9 अक्तूबर को ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत तक सीमित रखने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा 2019 में बनाए गए 27 प्रतिशत आरक्षण कानून को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया था। यह फैसला अशिता दुबे एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश शासन से जुड़ी याचिकाओं पर आया था। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि प्रदेश की सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी श्रेणी को 14 प्रतिशत आरक्षण ही प्राप्त होगा। हालांकि 29 सितंबर 2022 तक 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर नियुक्त हो चुके अभ्यर्थियों को राहत देते हुए उनकी सेवाएं सुरक्षित रखी गईं और उनके अतिरिक्त पदों का समायोजन आगामी तीन भर्ती प्रक्रियाओं में करने के आदेश दिए गए।
इसके विपरीत 29 सितंबर 2022 के बाद की नियुक्तियों में 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण व्यवस्था को अस्वीकार कर दिया गया। न्यायालय ने रोके गए 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से भरने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
वर्षों पुराना विवाद और 87:13 का फॉर्मूला
मध्यप्रदेश में 2019 से जारी इस विवाद के कारण भर्तियों पर रोक लगी थी। स्थिति को संभालने के लिए वर्ष 2022 में सामान्य प्रशासन विभाग ने 87:13 का फॉर्मूला तैयार किया था, जिसे न्यायालय की स्वीकृति मिली थी। इसके तहत विवादित 13 प्रतिशत सीटों के परिणाम रोककर 87 प्रतिशत पदों पर भर्ती प्रक्रिया पूरी की गई थी।