याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आपराधिक प्रकरण और विभागीय जांच एक ही तथ्य, दस्तावेज व साक्ष्य पर आधारित होते हैं। आरोपी को अपना बचाव उजागर करना पड़ेगा, जिससे आपराधिक ट्रायल में साक्षी अपना बयान उसी आधार पर बदल सकता है।
जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने पीड़िता के न्यायालयीन बयान दर्ज होने तक विभागीय जांच पर रोक लगा दी है। युगलपीठ ने पुलिस आयुक्त भोपाल को अपराध की विवेचना की मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए हैं।
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याचिकाकर्ता कुनुरू शरत की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि वह नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन में पदस्थ है। कार्यरत महिला सहकर्मी ने उसके खिलाफ अप्रैल 2024 में दुष्कर्म की एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसके उपरांत विभागीय जांच भी संस्थित हो गई। याचिकाकर्ता ने आपराधिक प्रकरण के लंबित रहने के दौरान विभागीय जांच स्थगित करने के संबंध में विभाग को आवेदन दिया था। विभाग द्वारा आवेदन को निरस्त कर दिए जाने पर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की शरण ली गई थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आपराधिक प्रकरण और विभागीय जांच एक ही तथ्य, दस्तावेज व साक्ष्य पर आधारित होते हैं। आरोपी को अपना बचाव (डिफेंस) उजागर करना पड़ेगा, जिससे आपराधिक ट्रायल में साक्षी अपना बयान उसी आधार पर बदल सकता है। इससे निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) के अधिकार से याचिकाकर्ता वंचित हो जाएगा। याचिका में यह राहत चाही गई थी कि आपराधिक ट्रायल खत्म होने तक विभागीय जांच में रोक लगाई जाए।
युगलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे को एक साथ चलाए जाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। अनुशासनात्मक कार्रवाई को रोकना उन मामलों में उचित कदम हो सकता है, जहां कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला गंभीर है और अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रखने से आपराधिक न्यायालय के समक्ष उनके बचाव को नुकसान पहुंचने की संभावना है। युगलपीठ ने अनुशासनात्मक कार्रवाई पर आगामी एक वर्ष या पीड़िता के बयान दर्ज होने तक रोक लगाई है।