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अंग्रेजी हुकूमत से लेकर लोकतांत्रिक शासन का गवाह रहा है मिंटो हॉल, जानें इसकी खासियत

Tue, 02 Oct 2018 09:42 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
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मिंटो हॉल
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भोपाल का मिंटो हॉल अंग्रेजी शासन, नवाबी शासन और फिर लोकतांत्रिक शासन का गवाह रहा है। अब यह पहले की तुलना में काफी बदल गया है। मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही 1956 से यह राजनीतिक हलचल का केंद्र रहा है। हालांकि अब इसे सम्मेलन केन्द्र में बदल दिया गया है। इस हॉल की कहानी 1909 से शुरू हुई थी। इसे अंग्रेजी इंजीनियर एसी रबेन की देखरेख में बनाया गया था।

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उस समय इस हॉल को 3 लाख रुपये की लागत से बनाया गया था और इसे बनाने में 24 सालों का समय लगा था। इसका नाम तत्कालीम जनरल लॉर्ड मिंटो के नाम पर मिंटो हॉल रख दिया गया। इसका आकार ब्रिटिश महारानी के मुकुट की तरह है। भोपाल की तत्कालीन शासक नवाब सुल्तान जहां बेगम के समय बने इस भवन का इस्तेमाल गेस्ट हाउस के रूप में कम और राज्य की सेना के मुख्यालय, आर्थिक सलाहकार के दफ्तर, पुलिस मुख्यालय और होटल के रूप में ज्यादा हुआ।

1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश के गठन के बाद इसे विधानसभा भवन बना दिया गया था। 1996 में नया भवन बन गया और राज्य की विधानसभा को वहां शिफ्ट कर दिया गया। उस समय से यह खाली पड़ा हुआ है। इसमें होटल खोलने की घोषणा हुई थी लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया। इस इमारत के ऐतिहासिक और भव्य स्वरूप को बरकरार रखते हुए 64 करोड़ रुपये खर्च करके इसे सम्मेलन केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।
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मिंटो हॉल को अब नई तकनीकों से लैस किया गया है। जिसमें 1100 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। भवन के अंदर लिफ्ट है। मुख्य हॉल के साथ ऑडिटोरियम, कमेटी कक्ष, मीडिया कक्ष भी बनाया गया है। सम्मेलन केंद्र में अत्याधुनिक ऑडियो-वीडियो सिस्टम, फायर फाइटिंग और आधुनिक एयर कंडीशनर लगाए गए हैं। भवन को आंतरिक और बाहरी लाइटिंग से सजाया गया है। वास्तु शास्त्र के आधार पर हॉल का इंटीरियर किया गया है।

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