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रैलियों में भीड़ के लिए तरसे बड़े नेता

Thu, 21 Nov 2013 01:15 PM IST
जयप्रकाश पाराशर, भोपाल
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दिल्ली में जो नजारा राहुल गांधी की सभा में दिखाई दिया वह मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कई राष्ट्रीय नेताओं के साथ हो रहा है। भोपाल में नरेंद्र मोदी की सभा हो या भोजपुर में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, शमशाबाद में मुलायम सिंह यादव और पेटलावद में शरद यादव जैसे नेताओं की सभाओं से भीड़ नदारद है।
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शरद यादवः जेडीयू के अध्यक्ष शरद यादव ने पेटलावद में जब हेलिकाप्टर से झांककर देखा तो सौ लोग भी नहीं थे और उनका हेलिकाप्टर आसमान में ही वापस थांदला के लिए लौट गया। शरद यादव की जबलपुर सभा में भी उपस्थिति बहुत कम थी। आजकल लोग हेलिकाप्टर देखने भी नहीं आते।

मुलायमसिंह यादवः सपा नेता मुलायमसिंह यादव की शमशाबाद रैली में 3000 लोग भी दिखाई नहीं दिए। वह सपा उम्मीदवार रुद्रप्रताप सिंह, जो कांग्रेस के बागी हैं, के समर्थन में रैली करने आए थे। शमशाबाद विधानसभा क्षेत्र में करीब 20,000 वोटर यादव हैं। लेकिन कांग्रेस की उम्मीदवार ज्योत्स्ना यादव हैं।
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यादव समाज ने निर्णय किया है कि वे ज्योत्स्ना के पक्ष में ही मतदान करेंगे। मुलायम की सभा में मुसलमानों की उपस्थिति भी कम थी। कांग्रेस नेता निरंजन यादव कहते हैं, ‘लोग जिज्ञासा से ही मुलायमसिंह को देखने आ जाते, लेकिन आए नहीं। यादव समाज तो पहले ही फैसला कर चुका है कि ज्योत्स्ना यादव को वोट देना है।’

नरेंद्र मोदीः आमतौर पर नरेंद्र मोदी की सभाओं में उपस्थिति अच्छी रहती है, लेकिन भोपाल की उनकी सभा में मामूली उपस्थिति थी। दो माह पहले यहीं नरेंद्र मोदी को सुनने करीब 3-4 लाख लोग एकत्र हुए थे और लालकृष्ण आडवाणी व शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में सभा में मोदी-मोदी के नारे लगे थे। बंसल न्यूज के चैनल हेड शरद द्विवेदी का कहना है, ‘यह शायद टेलीविजन के कारण हुआ है। नरेंद्र मोदी की सभा लोग दिन में तीन-बार सुन रहे हैं। सीधा प्रसारण हो रहा है। जब टीवी पर आदमी सभा सुन रहा है तो कई किलोमीटर गाड़ी चलाकर सभा सुनने कौन जाएगा।‘

सुषमा स्वराजः नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज भोजपुर और अन्य सीटों पर अक्सर सभाएं व प्रचार कर रही हैं, लेकिन उनके राष्ट्रीय कद के मुताबिक भीड़ नजर नहीं आ रही है। विदिशा से चुनाव लड़ने के बाद सुषमा स्वराज का उतना आकर्षण नहीं रहा कि भीड़ जमा हो। पत्रकार सुनील शुक्ला की राय है, ‘राष्ट्रीय नेताओं की समस्या यह है कि वे स्थानीय मुद्दों पर बोलते नहीं हैं, स्थानीय बोलियां उन्हें आती नहीं, और लोग स्थानीय मुद्दों पर बातें सुनना चाहते हैं।‘  
अरुण जेटलीः अरुण जेटली का भाषण सुनने वालों की भी कमी दिखाई दे रही है। उऩकी प्रेस ब्रीफिंग अच्छी रहती है लेकिन उनके नाम पर भी भाजपा नेताओं के लिए भीड़ जुटाना मुश्किल काम साबित हो रहा है। शायद उसका कारण भी यही है कि अरुण जेटली राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अच्छा बोलते हैं। लेकिन जो भीड़ सामने होती है उसकी दिलचस्पी स्थानीय मुद्दों में होती है।

हरीश रावतः केंद्रीय मंत्री हरीश रावत वैसे तो कांग्रेस की रणनीति बनाने और प्रेस को संबोधित करने का ही काम कर रहे हैं, लेकिन भीड़ जुटाना उनके लिए भी मुश्किल है। हरीश रावत के भाषणों में मध्य प्रदेश में किसी की दिलचस्पी नहीं। वह प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से ही टीवी चैनलों को बाइट देकर संतुष्ट हैं।
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