रविवार को मध्य प्रदेश के नगरीय निकाय के पहले चरण के नतीजे सामने आ गए हैं। कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार रहा है। छिंदवाड़ा में महापौर पद पर जीतने के साथ कांग्रेस के 26 पार्षद भी चुनकर आए हैं। 18 साल बाद भाजपा को सत्ता से दूर होना पड़ा है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे कमलनाथ की रणनीति ने काम किया। वहीं भाजपा की कुछ गलतियों ने भी उसे जीत से दूर कर दिया।
यूं तो हार की समीक्षा और उसके कारणों को भाजपा तो तलाशेगी ही, पर कुछ कारण जो सामने नजर आ रहे हैं, हम उन पर चर्चा करते हैं। पांच पॉइंट्स में जानते हैं क्या वजह रही भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा-
1. नाम तय करने में पिछड़ी भाजपा, इससे बढ़ा असंतोष
देखा जाए तो भाजपा ने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जब जारी की थी तो उसमें किसान मोर्चा से जुड़े जितेंद्र शाह को छिंदवाड़ा में बतौर कैंडिडेट बनाया गया था, लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा के जिला संगठन ने इस पर एतराज जताया और निगम में असिस्टेंट कमिश्नर रहे अनंत धुर्वे को कैंडिडेट बनवा दिया। गौर करने वाली बात यह है कि टिकट कटने से नाराज जितेंद्र शाह पार्टी के खिलाफ हो गए और उन्होंने बगावत का ऐलान कर दिया हालांकि बाद में उन्हें सरेंडर कर दिया गया लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वहीं पार्षदों के नाम तय करते समय भाजपा संगठन ने कई नामी चेहरों की टिकट काटकर नए चेहरों पर दांव खेला था, जो पूरी तरह से फ्लॉप रहा। जिन नामी गैरों की टिकट काटी गई उन्होंने बगावत का ऐलान करते हुए निर्दलीय नामांकन भर दिया था, ऐसे में शुरुआती दिनों में भाजपा का पूरा समय मान मनोबल में गुजर गया।
2. प्रचार प्रसार में बड़े चेहरे रहे गायब
एक तरफ कांग्रेस प्रत्याशी विक्रम आहके ने नाम फाइनल होते ही प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया था तो भाजपा प्रत्याशी अनंत धुर्वे प्रचार प्रसार में पिछड़ गए। यहां तक कि उनके साथ कोई भी भाजपा का बड़ा चेहरा प्रचार में नजर नहीं आया जिसका भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा की गुटबाजी का असर सोशल मीडिया में भी देखने को मिला। बीजेपी से बागी हुए महापौर और दो दर्जन से ज्यादा पार्षद प्रत्याशी को मानने में बीजेपी का पूरा सप्ताह खराब हुआ। बागियों की उठापटक में उलझी भाजपा कांग्रेस के मीम्स का जवाब देने में भी पीछे रही।
3. अपनी उपलब्धि नहीं गिना पाई भाजपा
18 साल निगम में रहने के बाद भी भाजपा की कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी। प्रदेश में भी भाजपा की सरकार रही, लेकिन इस दौरान छिंदवाड़ा निगम में भाजपा की कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होने का भी खामियाजा भाजपा प्रत्याशियों को झेलना पड़ा। इसके अलावा जो भी विकास हुए उन्हें भी भाजपा जनता के बीच ठीक से नहीं रख सकी। ज्यादातर पार्षदों के इलाके में भी यही बात सामने आई है। वहीं भाजपा को अपने प्रत्याशी की बेदाग छवि जनता के सामने प्रस्तुत करने में कोताही बरतना महंगा साबित हो गया।
4. कमलनाथ की प्रतिष्ठा पड़ी भारी
प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने छिंदवाड़ा निगम चुनाव को पहली बार अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा। पिछले 18 सालों से कमलनाथ के गढ़ में शहर की सरकार बीजेपी की है वह और बात थी, लेकिन इस बार कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पहली बार निगम चुनाव को कमलनाथ ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया। कमलनाथ ने पूरे दो दिन भरी बारिश में कांग्रेस महापौर प्रत्याशी विक्रम अहाके के लिए रोड शो किया। उन्होंने ठान लिया था कि इस बार नगर सरकार को बदलना ही है।
5. वेतन भोगी को नियमित करने का वादा कर गया खेल
प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने निगम के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित करने की घोषणा कर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना दिया। भाजपा ने निगम के सहायक आयुक्त रहे अनंत धुर्वे को जैसे ही अपना महापौर प्रत्याशी बनाया था, राजनैतिक गलियारों में चर्चा थी कि अनंत के निगम कर्मचारी होने की वजह से उनको निगम कर्मचारियों सहित उनके परिवार के अधिकांश वोट मिलेंगे। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में कमलनाथ ने कहा कि हम निगम के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमित करेंगे। कमलनाथ के प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए इस बयान ने निगम कर्मचारियों को आकर्षित किया।