पहला टेंडर: 76 फीसदी दर कम, फिर भी किया रद्द
साल 2018 के सितंबर महीने में मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विस कॉरपोरेशन लि. ने 64 जांच के लिए एनआईटी-203 लैब टेस्टिंग के लिए वेट लीज रीजेंट रेंटल बेसिस पर टेंडर जारी किया। यह टेंडर 28 जिला अस्पताल के लिए था। इसमें छह फर्मों ने भाग लिया, लेकिन चार ही तकनीकी पात्रता पूरी कर पाईं। इसमें साइंस हाउस ने 76, एसएल डायग्नोस्टिक ने 55, डॉ. खन्ना पैथकेयर प्रा. लिमि. ने 51 और एओवी इंटरनेशनल ने 43 फीसदी के डिस्काउंट रेट दिए। यानी साइंस हाउस ने सबसे कम दर का प्रस्ताव दिया। लेकिन, कॉरपोरेशन के तत्कालीन अधिकारियों ने इस टेंडर प्रक्रिया को प्रशासनिक कारण बता कर निरस्त कर दिया था।
दूसरा टेंडर: साइंस हाउस को दिया ढाई गुना ज्यादा दर पर काम
साल 2019 के जुलाई महीने में दोबारा टी-033 टेंडर लैब टेस्टिंग के लिए वेट लीज रेंटल बेसिस पर टेंडर जारी किया। यह टेंडर जिला अस्पताल और सिविल अस्पताल समेत 86 सेंटर के लिए था। इसमें सिर्फ दो निविदाकर्ता मेसर्स साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के कंसोर्टियम और मेसर्स मॉलिक्यूलर साइंटिफिक कोर हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड ने कंसोर्टियम के साथ भाग लिया। जानकारी के अनुसार इस टेंडर में साइंस हाउस को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसी शर्तें जोड़ी गईं, जिनसे सिर्फ दो ही फर्म भाग ले पाईं। यहां पर जांच का विषय है कि ऐसी कौन सी शर्तें थी, जिससे बाकी की अन्य पांच फर्म टेंडर में शामिल ही नहीं हो सकीं। वहीं, यह भी बताया जा रहा है कि टेंडर में शामिल दूसरी फर्मों को बाहर करने के लिए बार-बार अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। संबंधित फर्मों को हर बार मेल पर दस्तावेज उपलब्ध कराने के बाद भी बाहर कर दिया गया। इसके लिए यूएसएफडीए सर्टिफिकेट तय समय सीमा तक जमा न करने का कारण बताया गया, जबकि संबंधित फर्म ने सभी दस्तावेज टेंडर डॉक्यूमेंट में उपलब्ध कराए थे। फिर भी टेंडर से बाहर करने पर वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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ढाई गुना ज्यादा दर पर दिया ठेका
दूसरे टेंडर में साइंस हाउस ने सिर्फ 31 प्रतिशत कम दर डाली, जो पहले वाले टेंडर की तुलना में लगभग ढाई गुना ज्यादा थी। इसकी वजह से शासन पर जांच खर्च को बोझ ढाई गुना बढ़कर करोड़ों में पहुंच गया। जानकारों का कहना है कि पहले टेंडर में फर्म ने 76 प्रतिशत कम दर का प्रस्ताव दिया और दूसरे टेंडर में सिर्फ 31 प्रतिशत कम दर का प्रस्ताव दिया गया। दोनों की तुलना में यह 45 फीसदी अधिक था। ऐसे में सवाल उठता है कि इतना बड़ा अंतर कैसे नजरअंदाज किया गया? क्या तत्कालीन अधिकारियों के संबंधित फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया, क्या इसके बदलें में उन्हें भी फायदा पहुंचाया गया?
2023 में तीसरा टेंडर भी साइंस हाउस को मिला
नेशनल हेल्थ मिशन ने 2023 में सीएचसी, पीएचसी और ब्लॉक सेंटर पर टेस्टिंग के लिए हब एंड स्पोक मॉडल टेंडर जारी किया। इसमें तीन फर्में शामिल हुईं। यह टेंडर भी साइंस हाउस को मिला। ऐसा कहा जा रहा है कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने साइंस हाउस को टेंडर देने के लिए दबाव बनाया। हालांकि, कोई भी खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं है।
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200 करोड़ सालाना के काम पर सवाल?
साउंस हाउस के पास रीजेंट रेंटल बेसिस और हब एंड स्पोक मॉडल दोनों का ही काम है। इसमें प्रदेश के 84 जिला अस्पताल और सिविल अस्पताल में टेस्टिंग के साथ ही हब एंड स्पोक मॉडल में करीब 1800 सेंटर से सैंपल कलेक्ट करने और उसकी जांच का काम है। जानकारी के अनुसार इसके लिए एनएचएम करीब 15 से 16 करोड़ रुपये प्रतिमाह साइंस हाउस को भुगतान करता है। यानी सालाना करीब 180 से 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाता है।
करोड़ों का जीएसटी भी एनएचएम से लिया
साइंस हाउस को एनएचएम ने एनएबीएल सर्टिफाइड लैब के अनुसार भुगतान किया, जबकि प्रदेश के जिला और सिविल अस्पताल के 84 सेंटर में से सिर्फ 30 से 34 में ही एनएबीएल सर्टिफाइड लैब है। यह भी जानकारी के अनुसार पिछले चार महीने में बनी हैं। एनएबीएल में नार्मल लैब से टेस्ट की दर 20 से 25 प्रतिशत अधिक होती है। ऐसे में साइंस हाउस को बिना एनएबीएल लैब के भुगतान किया गया। वहीं, दूसरी तरफ लैब जांच पर केंद्र सरकार ने जीएसटी में छूट दी है। इसके बावजूद साइंस हाउस के कर्ताधर्ताओं ने करोड़ों रुपये का जीएसटी भी एनएचएम से लिया। अब सवाल यह है कि यह उसने सरकार को जमा किया या नहीं? हालांकि, अब इन मामलों में स्वास्थ्य विभाग जांच कर रहा है। इसमें फर्म को नोटिस जारी कर पूछा है कि उसने किस आधार पर जीएसटी क्लेम किया, साथ ही केंद्र से भी लैब टेस्टिंग पर जीएसटी को लेकर जानकारी मांगी गई है।
एक साल का एक्सटेंशन भी दिया
यह भी पता चला है कि साइंस हाउस के 2019 के टेंडर का समय मई 2025 में खत्म हो गया था। इसके बावजूद उसे जुलाई 2025 में एक साल का एक्सटेंशन दे दिया गया। इस बीच के समय का भी एनएचएम ने भुगतान कर दिया, जबकि टेंडर की शर्तों के अनुसार यदि फर्म को एक्सटेंशन देना था तो उसकी प्रक्रिया टेंडर खत्म होने के छह महीने पहले शुरू कर देनी चाहिए थी। लेकिन, ऐसा नहीं किया गया, यानी हर कदम पर नियमों को दरकिनार कर दिया गया।
सीजीएचएस/एनएबीएल की दरें और साइंस हाउस के टेंडर में दिए गए रेट
| परीक्षण |
सीजीएचएस/एनएबीएल दरें |
साइंस हाउस 2018 की दरें |
साइंस हाउस 2019 की दरें |
| हीमोग्लोबिन |
21 |
5.04 |
14.49 |
| प्लेटलेट काउंट |
55 |
13.20 |
37.95 |
| कंप्लीट CBC |
155 |
37.20 |
106.95 |
| यूरिक एसिड |
63 |
15.12 |
43.47 |
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आप वर्तमान एमडी से बात कर लीजिए
मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विस कॉरपोरेशन लि. के तत्कालीन एमडी जे. विजय कुमार ने कहा कि उस समय पहला टेंडर क्यों निरस्त हुआ, दूसरे टेंडर के समय क्या शर्तें थी इसकी जानकारी याद नहीं है। आप वर्तमान एमडी से बात कर लीजिए।
पुराने टेंडर के बारे में नहीं पता
मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विस कॉरपोरेशन लि. के एमडी मयंक अग्रवाल ने कहा कि पुराना टेंडर क्यों निरस्त किया गया। दूसरे टेंडर में कितने फर्में आई मुझे नहीं पता।
जांच चल रही है, कमेंट नहीं करूंगी
एनएचएम की एमडी सलोनी सिडाना से साइंस हाउस को लेकर पूछे सवाल पर उन्होंने कहा कि अभी इस मामले में जांच चल रही है, इसलिए वह इसमें कुछ भी टिप्पणी नहीं करेंगी।
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