मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना के तहत तैयार होने वाल संपत्ति दस्तावेजों का काम शुरू ही नहीं हो पाया हैं। पटवारियों के साा ही अब तहसीलदार भी विरोध में उतर आए हैं। एक साथ पटवारी के हस्ताक्षर को लेकर राजस्व अमले ने सवाल उठाए हैं। मंगलवार को तहसीलदार संघ, राजस्व निरीक्षक संघ, मध्यप्रदेश पटवारी संघ और प्रांतीय पटवारी संघ ने संयुक्त रूप से कहा कि पटवारी योजना के काम में पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं, लेकिन जिस संपत्ति में उनका कोई स्वामित्व या कानूनी अधिकार नहीं है, उसके दस्तावेज पर उन्हें ‘निष्पादक’ के रूप में हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी क्यों दी जा रही है, इसका वैधानिक आधार स्पष्ट होना चाहिए। संघों ने 13 अगस्त 2026 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि इसमें पटवारी को दस्तावेज के निष्पादन की भूमिका दिए जाने की बात है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह अधिकार किस अधिनियम, नियम, राजपत्र या वैध डेलिगेशन के तहत मिला है। संघों ने आदेश से जुड़ी मूल फाइल, अनुमोदन और रिकॉर्ड की जांच की मांग भी की है।
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रिकॉर्ड की जांच और दस्तावेज पर हस्ताक्षर अलग-अलग काम
राजस्व अमले का तर्क है कि जमीन का सर्वे, सीमांकन, मौके का सत्यापन और राजस्व रिकॉर्ड की जांच करना अलग काम है, जबकि किसी संपत्ति संबंधी कानूनी दस्तावेज को शासन या स्वामी की ओर से निष्पादित करना अलग। उनके मुताबिक मैदानी और रिकॉर्ड संबंधी जिम्मेदारी होने मात्र से पटवारी को संपत्ति दस्तावेज execute करने का अधिकार नहीं मिल जाता। संघों ने मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 और भू-अभिलेख नियमावली 2020 का हवाला देते हुए कहा कि उनके संज्ञान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसमें पटवारी को स्वतंत्र रूप से इस तरह की एग्जीक्यूशनरी पावर दी गई हो।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
संघों ने के. गोपी बनाम द सब-रजिस्ट्रार एवं अन्य मामले में 7 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। उनका कहना है कि इस फैसले में दस्तावेज के निष्पादन और उससे जुड़े अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है। इसी आधार पर वे सवाल उठा रहे हैं कि जब पटवारी के पास संबंधित संपत्ति में कोई टाइटल,राइट याइंटरेस्ट नहीं है, तो उसे एक्जीक्यूटेंट की भूमिका किस कानूनी अधिकार से दी गई है। संघों ने संविधान के अनुच्छेद 299 का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि यदि दस्तावेज राज्य की ओर से निष्पादित किए जा रहे हैं तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि पटवारी को राज्य की ओर से ऐसे दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने और राज्य को उससे बाध्य करने की शक्ति किस प्रावधान से मिली है।
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पंजीयन की भूमिका अलग, निष्पादन पर सवाल
संघों के अनुसार स्वामित्व प्रक्रिया में पंजीयन और दस्तावेज का निष्पादन दो अलग कानूनी कार्य हैं। पंजीयन के लिए तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक या प्रभारी राजस्व निरीक्षक को Sub-Registrar की भूमिका दिए जाने का उल्लेख है, लेकिन पटवारी को एक्जीक्यूटेंट बनाने का अलग वैधानिक आधार स्पष्ट नहीं है। राजस्व अमले का कहना है कि ड्रोन सर्वे, ग्राउंड ट्रूथिंग, सीमांकन, पहचान और रिकॉर्ड सत्यापन जैसे काम पटवारी पहले की तरह करते रहेंगे। आपत्ति केवल अंतिम संपत्ति दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उससे जुड़ी कानूनी जवाबदेही को लेकर है।
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योजना के खिलाफ नहीं, भूमिका स्पष्ट करने की मांग
संघों ने साफ किया कि उनकी आपत्ति स्वामित्य योजना के खिलाफ नहीं है। उनके मुताबिक योजना से ग्रामीणों को संपत्ति का रिकॉर्ड मिल रहा है और बैंक ऋण जैसी सुविधाओं का रास्ता भी आसान हो रहा है। संघों की मांग है कि दस्तावेज का निष्पादन कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, एसडीओ/एसडीएम या शासन द्वारा विधि-सम्मत रूप से अधिकृत सक्षम अधिकारी से कराया जाए। साथ ही पटवारियों की मैदानी और अभिलेखीय भूमिका स्पष्ट रखते हुए उन्हें लिखित मार्गदर्शन और कानूनी संरक्षण दिया जाए। उनका कहना है कि जिस काम की वैधानिक अधिकारिता स्पष्ट नहीं है, उसमें व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही लेकर हस्ताक्षर करना उचित नहीं होगा।