अपने सेवाकाल से ज्यादा उपन्यास लेखन और उससे भी अधिक विवादास्पद सोशल मीडिया पोस्ट से चर्चा में रहने वाले IAS अधिकारी नियाज खान फिर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने पाकिस्तानी लेखक की बात का समर्थन करके लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। खान ने ब्राह्मणवाद को श्रेष्ठ बताते हुए भी खुद को अलग साबित करने की कोशिश की है। सोशल मीडिया के जरिए ही IAS नियाज ने बाहरी देशों में होने वाले काले गोरे के फर्क पर भी तंज कसा है।
कभी जेल में रहकर मोनिका बेदी और अबू सलेम की प्रेमकथा पर उपन्यास लिखने की अनुमति मांगकर वे चर्चा में आए। कभी ब्राह्मण विषय पर आधारित पुस्तक लिखकर खुद को अलग साबित किया। अपने पद और पदस्थापना को लेकर भी IAS नियाज खान इतने विवादों में रहे हैं कि उनके साथ महज तीन साल में 11 ट्रांसफर किए जाने जैसा रिकॉर्ड भी दर्ज हो गया है। लंबी खामोशी के बाद नियाज खान फिर चर्चा में हैं। इस बार उनको लेकर चर्चा का विषय उनका पाकिस्तानी लेखक की प्रशंसा है। यह प्रशंसा उन्होंने लेखक द्वारा ब्राह्मणवाद के पक्ष को रेखांकित करने पर की है।
यह कहा नियाज ने
आईएएस खान ने एक ट्वीट में पाकिस्तानी विचारक और फिजिक्स के नामी प्रोफेसर परवेज हुदभाय के भारत के ब्राह्मणों की सराहना करने वाले बयान की तारीफ की है। खान ने लिखा है कि ब्राह्मण का सत्य हमेशा रहेगा। पाकिस्तान के इस विचारक ने ब्राह्मणों की तारीफ की है। मैं भी उनसे सहमत हूं। खान ने लिखा कि ब्राह्मण की सबसे बड़ी ताकत उनकी तेज बुद्धि और तर्क शक्ति रही है और इसलिए मुस्लिम साम्राज्य में भी उन्होंने बड़ा ओहदा हासिल किया। आप से अपेक्षित है कि समाज को अंधविश्वास से बचाएं, संस्कृति की रक्षा करें। जहां हैं, वहां मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं। हीन भावना से कभी ग्रसित न हों। गौरतलब है कि पाकिस्तानी विचारक और फिजिक्स के नामी प्रोफेसर परवेज हुदभाय ने भारत की शिक्षा व्यवस्था की तारीफ करते हुए पिछले दिनों कहा था कि हिंदुस्तान के प्राचीन इतिहास में ब्राह्मणों का खास फोकस गणित पर रहा है।
विदेशों में हो रहा नस्लभेद : नियाज़
आईएएस और लेखक नियाज खान ने नस्लभेद के खिलाफ ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है कि गोरे देशों में अश्वेत लेखकों के साहित्य की कदर नहीं की जाती है। अश्वेत होना अंग्रेजी साहित्य में बहुत बड़ी बाधा है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या काला रंग होना या अश्वेत होना अंग्रेज़ी साहित्य में अंतरराष्ट्रीय मुकाम हासिल करने में बाधक होना चाहिए। खान ने लिखा है कि मैंने गोरे देशों में कई बुक भेजी पर अश्वेत होने के कारण वहां मेरे साहित्य की कदर नहीं हुई। मैंने चार अंतरराष्ट्रीय नॉवेल लिखे पर कोई भी अंतरराष्ट्रीय मुकाम हासिल नहीं कर पाया। गोरों के देश में सिर्फ उन गिने-चुने अश्वेत लेखकों को ही सफलता मिली, जो वहां जाकर रहे। खान ने लिखा कि अश्वेत होना अंग्रेजी साहित्य में बहुत बड़ी बाधा है। हम बहुत अच्छा लिखें पर अश्वेत होने के कारण हमारी किताबें गोरे न देखें, ये कहां का न्याय है? मुझे दुःख है कि अश्वेत होने के कारण अंग्रेजी नॉवेल लिखने पर मेरी 14 साल की कड़ी मेहनत बेकार गई।