जिस तकनीक की शुरुआत सियाचिन जैसे बेहद ठंडे इलाके में सैनिकों के मानव अपशिष्ट के निपटारे की समस्या से निपटने के लिए हुई थी, अब उसका इस्तेमाल घरों, दफ्तरों और व्यावसायिक भवनों में भी किया जा सकेगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की ग्वालियर स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (DRDE) ने बायो-डाइजेस्टर का नया और ज्यादा प्रभावी संस्करण तैयार किया है। इस तकनीक की खासियत यह है कि मानव अपशिष्ट को बाहर ले जाने या सेप्टिक टैंक में जमा करने के बजाय उसी जगह पर उसका उपचार किया जा सकता है। इससे सीवरेज नेटवर्क की सुविधा नहीं होने वाले इलाकों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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सेप्टिक टैंक का विकल्प
डीआरडीओ के बायोप्रोसेस टेक्नोलॉजी डिवीजन के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नए बायो-डाइजेस्टर को पारंपरिक सेप्टिक टैंक की जगह लगाया जा सकता है। इसमें मानव अपशिष्ट को एक विशेष टैंक में मौजूद बैक्टीरिया की मदद से तोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया बिना ऑक्सीजन के होती है। नए मॉडल में केवल जैविक प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि इसके बाद हवा देने और ठोस पदार्थों को अलग करने जैसी अतिरिक्त प्रक्रियाएं भी अपनाई गई हैं। इससे बाहर निकलने वाले पानी की गुणवत्ता पहले के मुकाबले बेहतर होती है।
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बार-बार टैंक खाली कराने की जरूरत कम
पारंपरिक सेप्टिक टैंक में समय के साथ गाद जमा होती रहती है और उसे निकालने के लिए नियमित रूप से टैंक की सफाई करानी पड़ती है। बायो-डाइजेस्टर में अपशिष्ट का मौके पर ही उपचार होने के कारण गाद का निर्माण काफी कम होता है। इससे बार-बार टैंक खाली कराने की जरूरत भी घट सकती है। यह तकनीक उन कॉलोनियों, कार्यालयों, संस्थानों और व्यावसायिक इमारतों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां भूमिगत सीवरेज की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
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घरेलू यूनिट की कीमत करीब 80 हजार
एक सामान्य आवासीय यूनिट की शुरुआती कीमत करीब 80 हजार रुपए बताई गई है। हालांकि वास्तविक कीमत क्षमता, स्थापना की जरूरत और इसका इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या के आधार पर अलग हो सकती है। डीआरडीओ ने इस तकनीक को बड़े स्तर पर बनाने के लिए एक कंपनी को लाइसेंस दिया है। अन्य औद्योगिक इकाइयों से भी तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर बातचीत चल रही है। तकनीक के लाइसेंस की फीस 96 लाख रुपए तय की गई है।
एमपी के एमएसएमई के लिए भी अवसर
डीआरडीओ ने मध्यप्रदेश सरकार के सामने इस तकनीक के निर्माण में रुचि रखने वाले छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए सहायता की जरूरत का मुद्दा भी रखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कई उपयोगी रक्षा तकनीकों को एमएसएमई स्तर पर बाजार तक पहुंचाया जा सकता है, लेकिन शुरुआती लाइसेंस फीस छोटी कंपनियों के लिए बड़ी बाधा बन सकती है। ऐसे में राज्य स्तर पर प्रोत्साहन या सब्सिडी से स्थानीय उद्योगों को इस तरह की तकनीक अपनाने में मदद मिल सकती है।
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70 से जयादा लाइसेंधारी बाो डाइजेस्टर का निर्माण कर रहे
इस बायो-डाइजेस्टर तकनीक की जरूरत डीआरडीओ को सियाचिन में महसूस हुई थी। बेहद कम तापमान वाले इस इलाके में मानव अपशिष्ट सामान्य तरीके से गलता-सड़ता नहीं है। बर्फ पिघलने पर यह आसपास के इलाके को प्रदूषित कर सकता है। इसी समस्या के समाधान के लिए विकसित तकनीक को बाद में अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों के हिसाब से तैयार किया गया। डीआरडीओ की ग्वालियर प्रयोगशाला ने इसके बाद तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के लिए विकसित किया और रेलवे में भी इसका इस्तेमाल शुरू हुआ। अब तक 70 से ज्यादा लाइसेंसधारी तकनीकी साझेदार बायो-डाइजेस्टर का निर्माण कर रहे हैं।