मामला औकाफ ए शाही की निगरानी वाली संपत्ति शाही बड़ा बाग कब्रिस्तान का है। नवाब शासन काल में वक्फ की गई करीब 35 एकड़ जमीन में यह कब्रिस्तान स्थित है। यहां नवाब परिवार और शाही खानदान से जुड़े लोगों को दफनाया जाता है।
अब चल रहे जेसीबी
नियमों की अनदेखी
वक्फ अधिनियम 1995 के प्रावधानों के मुताबिक किसी भी कब्रिस्तान की जमीन को स्थाई या अस्थाई किरायादारी पर नहीं दिया जा सकता। लेकिन औकाफ ए शाही ने 11 महीने के किराया समझौते पर कब्रिस्तान की जमीन कंस्ट्रूशन कंपनी को सौंप दी है। हालांकि इस कंपनी से जुड़े लोग यहां करीब 3 साल तक काम जारी रहने की बात कह रहे हैं।
कब्जे से घिरे कब्रिस्तान पर एक और अतिक्रमण के आसार
नई और पुरानी कमेटी में खींचतान
हाल ही में औकाफ शाही की पुरानी कमेटी को भंग कर एक नई कमेटी गठित की गई है। नई 3 सदस्यीय कमेटी इस किरायादारी समझौते से खुद को अलग बता रही है। जबकि पुरानी कमेटी के सचिव आजम तिरमिजी इस समझौते को वक्फ बोर्ड की सहमति से होना बता रहे हैं। आजम का कहना है कि राकेश शर्मा की कंस्ट्रक्शन कंपनी से 11 महीने का एग्रीमेंट किया गया है। करीब 15 लाख रुपए में यह समझोता हुआ है। जिसके लिए मप्र वक्फ बोर्ड से भी सहमति ली गई है।
इनका कहना है
यह कब्रिस्तान शाही औकाफ के अधीन है। किरायादारी उनके अधिकार में है। बोर्ड से अनुमति मांगी गई थी। आमदनी से किए जा सकने वाले बेहतर कामों की मंशा के साथ यह अनुमति दी गई है।