नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण तथा अन्य विकास परियोजनाओं के तहत हुई पेड़ों की कटाई के बदले किए जाने वाले क्षतिपूर्ति पौधारोपण के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने करीब 80 हजार पौधों के रोपण और विकास एजेंसियों से प्राप्त करोड़ों रुपये के बजटीय कोष के उपयोग को लेकर वन विभाग, भोपाल नगर निगम और राज्य सरकार के रवैये पर सख्त असंतोष जताया है। पीठ ने साफ किया कि केवल कागजों पर पौधे लगाना या अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोपे गए पौधों का जीवित रहना भी अनिवार्य है।
पर्यावरणविद् नितिन सक्सेना द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति श्योकुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने आदेश पारित किया। पीठ ने वन विकास और पर्यावरण वानिकी मंडल से सीधा प्रश्न किया कि वर्ष 2025 में पौधारोपण के लिए जमा कराई गई राशि का उपयोग करके वर्ष 2026 के मानसून सत्र में पौधारोपण की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। ट्रिब्यूनल ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पौधारोपण का कार्य केवल कागजी औपचारिकताओं और अभियानों तक ही सीमित रह जाता है, जबकि धरातल पर उसकी देखरेख नहीं होती।
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पांच वर्षों का मांगा हिसाब-किताब
ट्रिब्यूनल ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख को निर्देश जारी किए हैं कि वे पिछले पांच वर्षों का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत करें। इसके तहत राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, विभिन्न सरकारी तथा निजी विकास एजेंसियों से पिछले पांच वर्षों में प्राप्त धनराशि की जिला-वार रिपोर्ट मांगी गई है। इसके साथ ही, किस वर्ष कितनी राशि प्राप्त हुई और उसके मुकाबले वास्तव में कितना पौधारोपण किया गया, इसकी अलग-अलग सूचियां पेश करने का आदेश दिया गया है। पीठ ने कहा कि विकास कार्यों के नाम पर काटे गए वृक्षों की भरपाई पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए।
शत-प्रतिशत उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के निर्देश
भोपाल नगर निगम और संभागीय वन अधिकारी को निर्देश दिए गए हैं कि वे पिछले पांच वर्षों में रोपे गए उन सभी पौधों का नए सिरे से आकलन करें, जो पानी या समुचित रखरखाव के अभाव में सूख गए हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि उपलब्ध बजट की बची हुई राशि से तुरंत मृत पौधों के स्थान पर नए पौधे लगाए जाएं, ताकि पौधों की शत-प्रतिशत उत्तरजीविता सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त, जब तक पौधे पूरी तरह से जमीन में स्थापित होकर बड़े नहीं हो जाते, तब तक उन्हें नियमित रूप से पानी देने की मजबूत व्यवस्था बनाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
विभिन्न विभागों के लिए समय-सीमा तय
मामले में लापरवाही बरतने वाली संस्थाओं के लिए ट्रिब्यूनल ने कड़ी समय-सीमा निर्धारित की है। पूर्व आदेशों के बावजूद जवाब दाखिल न करने पर भोपाल नगर निगम को अगली सुनवाई से पहले अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया गया है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 10 कार्य दिवसों के भीतर अपनी वर्तमान स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। वहीं वन विभाग को पेड़ों की कटाई के एवज में जमा हुई राशि का सत्यापन करने और उप-संभागीय अधिकारी द्वारा उठाए प्रश्नों का समाधान करते हुए चार सप्ताह के भीतर अंतिम विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। ट्रिब्यूनल ने इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 अक्तूबर की तिथि निश्चित की है।