मध्यप्रदेश में खंडवा लोकसभा के साथ-साथ जोबट और पृथ्वीपुर में भाजपा को जीत मिली। खंडवा के नतीजे आश्चर्य पैदा नहीं करते, पर जोबट और पृथ्वीपुर में भाजपा की जीत चौंकाने वाली है। रैगांव में जरूर भाजपा ने अपनी सीट गंवाई, पर उसके स्थानीय कारण हो सकते हैं। मोटे तौर पर देखें तो इन नतीजों ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी पर पकड़ मजबूत कर दी है। उत्तराखंड, गुजरात और कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने का जो सिलसिला भाजपा ने शुरू किया था, वह मध्यप्रदेश में आकर थमता दिख रहा है।
पिछले काफी समय से राजनीतिक पंडित यही कह रहे थे कि उपचुनावों के नतीजे शिवराज की कुर्सी का भाग्य तय करेंगे। जहां तक नतीजों का सवाल है, शिवराज ने साबित किया कि उनकी लोकप्रियता अब भी कायम है। यह चुनाव शिवराज के लिए लिटमस टेस्ट माने जा रहे थे। इसी वजह से मुख्यमंत्री ने चारों क्षेत्रों में 40 से अधिक चुनावी रैलियां की। इतने पर जोबट और पृथ्वीपुर जैसे कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ में जीत हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है। यह निश्चित तौर पर शिवराज को हटाने को लेकर अटकलों पर विराम लगाएगा। साथ ही पार्टी के भीतर भी जो लोग मुख्यमंत्री बदलने के लिए सक्रिय हो रहे थे, उनकी गतिविधियों पर अंकुश तो लग ही जाएगा।
सबसे पहले बात जोबट की। यहां भाजपा की जीत बहुत मायने रखती है। 2019 के लोकसभा चुनावों में भी इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को बढ़त मिली थी। ऐसे में भाजपा ने कांग्रेस की ही नेत्री सुलोचना रावत को पार्टी में शामिल कर उम्मीदवार बनाया तो गुटबाजी भी सामने आ गई थी। जैसे-तैसे सब कंट्रोल हुआ और भाजपा ने बड़ी आसानी से कांग्रेस की चुनौती को शिकस्त दी।
पृथ्वीपुर की बात करें तो वहां स्थिति थोड़ी अलग थी। कांग्रेस ने अपने पूर्व मंत्री के बेटे नितेंद्र राठौड़ पर भरोसा किया था। लगा था कि संवेदना की लहर में सीट बचाने में कामयाब हो जाएगी। पर, ऐसा हुआ नहीं। भाजपा ने डॉ. शिशुपाल यादव को चुनावी समर में उतारा और जीत हासिल की। जहां तक रैगांव की बात है तो वहां तीन-चार फेक्टर भाजपा के खिलाफ गए। उसमें सबसे अहम था पूर्व मंत्री जुगल किशोर बागरी के परिवार का विरोध। इसने रैगांव में भाजपा उम्मीदवार प्रतिमा बागरी को काफी नुकसान पहुंचाया।
बसपा का फेक्टर भी हावी रहा
पृथ्वीपुर और रैगांव, दोनों ही विधानसभा सीटों पर बसपा का अच्छा-खासा प्रभाव है। आम तौर पर बसपा ने अपनी पॉलिसी ही बना ली है कि उपचुनावों में नहीं उतरना है। इसका भी इन उपचुनावों के नतीजों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। दरअसल, गैर-भाजपा वोट अक्सर इन सीटों पर बसपा और कांग्रेस में बंटते हैं। ऐसे में लग रहा था कि बसपा की गैरमौजूदगी का लाभ कांग्रेस को मिलेगा। रैगांव में यह दिखा जरूर, पर पृथ्वीपुर में बिल्कुल भी नहीं। रैगांव में कल्पना वर्मा ने इससे पहले भी कांग्रेस से चुनाव लड़ा है। वह हारने के बाद भी इलाके में सक्रिय रहीं, जिसका लाभ उन्हें उपचुनाव में मिला। लोकसभा चुनावों से ठीक पहले बसपा की उषा चौधरी का कांग्रेस में शामिल होना भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद रहा।
खंडवा में कांग्रेस ने दिया वॉकओवर
खंडवा लोकसभा सीट पर लगा ही नहीं कि कांग्रेस लड़ रही है। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव की उम्मीदवारी पर किंतु-परंतु के चलते जब उन्होंने चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया तो पार्टी की हार तय हो गई थी। पार्टी एकजुट दिखी ही नहीं। यादव भी पार्टी के प्रचार में अनमने से दिखाई दिए। दूसरी ओर, भाजपा ने पूर्व सांसद नंदकुमार सिंह चौहान के बेटे की बजाय उनके करीबी रहे ज्ञानेश्वर पाटिल को उम्मीदवार बनाया। बाकी काम संगठन ने कर दिया। तभी तो पार्टी 80 हजार से अधिक वोटों से जीत हासिल करने में कामयाब रही।
(लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। यूएनआई-वार्ता, नईदुनिया, ईटीवी में लीडरशिप पोजिशन पर रहे हैं।)