लोगों का नजरिया बदल रहा है। भले ही सामाजिक स्तर पर नहीं, लेकिन चिंतन और पढ़ने के स्तर पर यह बदलाव नजर आ रहा है। पाठक ऐसी महिलाओं के बारे में जानना और पढ़ना चाहते हैं जिन्होंने समाज में बदलाव की नींव डाली।
यही कारण है कि मोती महल लॉन में आयोजित 11वें पुस्तक मेले के महज दो दिन में ही महिला साहित्यकारों की आत्मकथाएं पुरुषों की तुलना में अधिक तेजी से बिकी हैं, जिसकी उम्मीद प्रकाशकों को कतई नहीं थी।
जीवनियों से इतर महिला साहित्यकारों की और रचनाएं भी दर्शकों को खासी रास आ रही हैं जबकि कुछ जीवनियां तो ऐसी रहीं, जिनका स्टॉक खत्म हो गया। राजकमल प्रकाशन के विनोद तिवारी ने बताया कि ट्रेंड में बदलाव नजर आ रहा है।
पिछले साल तक वरिष्ठ पुरुष साहित्यकारों की जीवनियां बहुत बिक रही थीं, लेकिन इस बार महिलाओं की आत्मकथाएं पसंद की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा की जीवनियों के स्टॉक खत्म हो गए हैं।
कई लोगों ने तो एडवांस में ऑर्डर दे रखे हैं। वहीं, सामयिक प्रकाशन के ललित कुमार ने बताया कि कृष्णा अग्निहोत्री की जीवनी ‘लगता नहीं दिल मेरा’ व ‘और और औरत’ पांच कॉपियां बिक चुकी हैं जबकि दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में इस किताब को खरीदने के लिए दर्शक लाइनें लगाते थे।
राजपाल प्रकाशन के अशोक शुक्ल ने बताया कि लोगों की सोच में बदलाव नजर आ रहा है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ महिलाएं ही ये जीवनियां खरीद रही हैं। पुरुष भी इन पुस्तकों को खासी पसंद कर रहे हैँ।
महिला साहित्यकारों की जीवनियाें में अमृता प्रीतम, पद्मिनी वैद्य पसंद की जा रही हैं जबकि विष्णु प्रभाकर व कमलेश्वर जो हर साल बिकते थे, अभी तक एक भी कॉपी नहीं बिकी। पुरानी साहित्यकारों के अलावा नई महिला साहित्यकारों की आत्मकथाएं भी बिक रही है।
साथ ही चित्रा गर्ग की लिखी ‘भारतीय शिखर महिलाएं’, जिसमें महिलाओं की जीवनियों का संग्रह है और भगवती चरण वर्मा की लिखी साहित्यकारों की जीवनियों का कोष ‘हिंदी के चर्चित उपन्यासकार’ काफी पसंद किए जा रहे हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन के राहुल श्रीवास्तव बताते हैं कि अमूमन लोग महिला साहित्यकारों की जीवनियां नहीं पढ़ते, इसलिए प्रकाशनों में रखी नहीं जाती, लेकिन इस बार पाठक इनकी डिमांड कर रहे हैं।
स्टॉल पर जीवनियों के अलावा ‘गालिब घुटी शराब’ बहुत बिक रही है। वाणी प्रकाशन स्टॉल पर भी रविवार को महिला साहित्यकारों की आत्मकथाओं से लेकर उनके स्त्री विमर्श की किताबें खूब बिकीं। सबसे अधिक बिक्री वर्जिनिया वुल्फ की हुई, जो कैंसर पीड़ित लेेखिका की आत्मकथा है।
ये आत्मकथाएं भी बिकीं
छह भागों में तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा की छह प्रतियां, सुशीला डाकघोरे की ‘शिकंजे का दर्द’ आठ, पद्मा सचदेवा की ‘लता ऐसा कहां से लाऊं’ चार, मन्नू भंडारी की ‘एक कहानी यह भी’ व कृष्णा अग्निहोत्री की ‘और... और... औरत’ पांच-पांच और साहित्यकार शिवानी की ‘एक थी रामरती’ व इस्मत चुगताई की ‘कागजी है पैरहन’ की तीन-तीन प्रतियां बिक चुकी हैं।
भीष्म साहनी की ‘आज के अतीत’ व मधुरेश की ‘आलोचक का आकाश’ की एक-एक प्रतियां बिकीं, लेकिन कांति कुमार जैन की ‘बैकुंठपुर में बचपन’, कमलेश्वर की ‘यादों के चिराग’, ‘जलती हुई नदी’ और अमृतलाल नागर की ‘टुकड़े-टुकड़े दास्तान’ की एक भी प्रतियां नहीं बिकी हैं।
आते ही बिक गईं ‘मुदर्हिया’
डॉ. तुलसीराम की जीवनी मुदर्हिया को भले ही लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल न किया गया होे, लेकिन पुस्तक मेले में किताब की डिमांड यह रही कि दो दिन में सभी प्रतियां बिक गईं। जबकि पाठक नई प्रतियां मंगाने के ऑर्डर दे चुके हैं।
राजकमल प्रकाशन के विनोद तिवारी ने बताया कि पहले दिन ही सारी प्रतियां बिक गईं, जिसकी उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने बताया कि पाठक आ रहे हैं और जल्द से जल्द पुस्तक मंगाने को कह रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल अन्य प्रकाशनों के स्टॉल पर रहा।