एसबीआई के बीच कोई संविदात्मक संबंध नहीं था
न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला लखनऊ निवासी नेहा मिश्रा की याचिका को मंजूर करके दिया। अदालत ने कहा कि एसबीआई ने नेहा मिश्रा के खाते से उनके पति के बकाया की वसूली के लिए कोई कानूनी आधार नहीं बताया, जबकि नेहा मिश्रा का बैंक के साथ कोई अनुबंध नहीं था।
मिश्रा के पति, जो लखनऊ के एक अस्पताल में सहायक प्रोफेसर थे, ने 3 नवंबर, 2020 को एसबीआई से 15 लाख रुपये का लोन लिया था। आदेश के अनुसार, मिश्रा न तो ऋण के हस्ताक्षरकर्ता थीं और न ही सहमति देने वाले पक्षकार, और न ही वे सह-आवेदक, सह-ऋणकर्ता, गारंटर, ज़मानतदार, क्षतिपूर्तिकर्ता या नामित व्यक्ति थीं। अतः न्यायालय ने यह दर्ज किया कि मिश्रा और एसबीआई के बीच कोई संविदात्मक संबंध नहीं था।
आदेश में यह भी कहा गया
यह ऋण एसबीआई जनरल इंश्योरेंस से लिए गए बीमा कवर के माध्यम से सुरक्षित था। आदेश में कहा गया कि मिश्रा के पति ने कथित तौर पर इस कवर के लिए ₹8,803 का प्रीमियम अदा किया था। उनकी मृत्यु 6 मई, 2021 को कोविड-19 से हुई।
इसके बाद एसबीआई ने मिश्रा से ऋण की बकाया राशि के भुगतान की मांग की और उन्हें 23 सितंबर, 2025 को एक कानूनी नोटिस जारी कर ब्याज सहित ₹13,87,382 की मांग की। इसके बाद दोनों पक्षों ने बातचीत शुरू की। इसी दौरान एसबीआई ने मिश्रा के नाम पर जमा की गई एक सावधि जमा राशि को भुना लिया और उनके खाते से ₹19,90,693 की राशि निकाल ली।
याची मिश्रा के वकील ने तर्क दिया कि उनका एसबीआई के साथ कोई संविदात्मक संबंध नहीं था और वसूली कानूनी रूप से अनुमेय नहीं थी। इसके जवाब में, एसबीआई ने ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से ऋण बकाया की वसूली से संबंधित निर्णयों का हवाला दिया।
मामले की सुनवाई के बाद, अदालत ने एसबीआई को निर्देश दिया कि वह मिश्रा को ₹19,90,693 की राशि ब्याज सहित चार सप्ताह के भीतर वापस कर दे, उस दर पर जिस पर उन्हें फिक्स्ड डिपॉजिट का लाभ मिल रहा था। साथ ही बैंक को मिश्रा को दंडात्मक मुआवजे के तौर पर 1 लाख रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया।