भगवान भूत भावन महादेव के त्रिशूल पर बसी काशी के इर्द-गिर्द बसे मिर्जापुर, गाजीपुर, सोनभद्र, चंदौली, भदोही, आजमगढ़, मऊ और जौनपुर में सातवें चरण का संग्राम होगा। जैसे काशी का निराला अंदाज है, वैसी ही इन जनपदों की भी निराली कथाएं हैं। ऐसा हो भी तो क्यों न? जिस बनारस में लस्सी पी नहीं जाती ‘भिड़ाई जाती है’, ‘आवा रजा लस्सी भिड़ाय लिहल जाए’, ‘भांग छनल कि नाहीं’ और एक-दूसरे का स्वागत ‘गुरू’ शब्द से किया जाता हो...। दिलचस्प यह भी है कि हिंदी जगत में गुरु में भले ही ऊ की मात्रा छोटी होती हो, लेकिन बनारसी ‘गुरू’ बड़ा ही होता है। दुनिया के लिए बाबा विश्वनाथ भले ही ईश्वर हों, लेकिन बनारस वालों के लिए तो वे आध्यात्मिक सखा ही हैं...। ऐसे सखा जिनसे बनारसी रोज चेतना के स्तर का खेल खेलते हैं...। ऐसे लोगों की मस्ती आसपास वालों पर कुछ तो असर डालेगी ही। जिस जमीन पर बड़े-बड़ों को ही नहीं बाबा यानी भगवान शिव तक को भी उलाहना देने से लोग बाज न आते हों...। चोट लग जाने पर बाबा से नाराज हो जाते हों...। मंदिर जाना बंद कर देते हों...। किसी ने पूछ लिया तो धड़ से जवाब देते हों, बाबा होइहें त अपने घरै क...। आजकल बतकही बंद चलत हव... । हम उनसे कह देहले हईं, ‘जब बुलइबा, तबै आइब।’ जहां के लोगों की नजर में मणिकर्णिका घाट पर चिता नहीं, माया की काया जलती है...। जिस जमीन का एक हिस्सा साहित्य के सर्जकों को जन्म देता हो, तो दूसरा सियासत के चेहरों को...। जिस धरती पर कहीं राष्ट्रवाद की धारा बहती हो, तो कहीं वामपंथ या समाजवाद की...। जहां सरोकारी और विशुद्ध सियासत के उदाहरण भी मिल जाते हों और राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ को भी समर्थन मिल जाता हो...। वहां के लोगों के दर्शन व दृष्टि की भविष्यवाणी करने का दम किसमें हो सकता है।
हर तरह के रंग, कहीं सब ढंग से तो कहीं कुछ बेढंग
साहित्य, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, गणित, कला, संगीत जैसे अनगिनत क्षेत्रों में शीर्ष स्थान बनाने वाली काशी को, अखाड़ों और लंगोट की पहचान भी विचित्र दिखाने के साथ ही विशिष्ट भी बनाती है। तभी तो पं. जवाहरलाल नेहरू को बनारस को पूर्व दिशा का शाश्वत नगर कहना पड़ा। इसीलिए ‘बनारस में सब गुरू, केहू नाहीं चेला’ कहावत चर्चा में चल पड़ी। ‘जिया रजा बनारस’ जैसे तीन शब्दों में आत्मीयता और मिठास जताने वाले शहर बनारस और इसके आसपास की धरती के बारे में कोई एक निष्कर्ष निकालना कठिन है। बनारस तेरे रंग हजार पुस्तक लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार स्व. कमल नयन कहा करते थे कि न गंगा की थाह का अंदाज लगाया सकता है और न बनारसियों की बात का।
सियासत की बहुरंगी छटा
सात चरण के चुनावी संग्राम की जमीन सियासत की बहुरंगी छटा बिखेरती रही है। सनातन संस्कृति के सरोकारों वाले काशी ने ऊदल, रुस्तम सैटिन, सत्यनारायण सिंह जैसे वामपंथियों को भी समर्थन दिया, तो पूर्वांचल की दरिद्रता और दुश्वारियों का लोकसभा में उल्लेख कर इतिहास बना देने वाले विश्वनाथ गहमरी जैसे सांसद की जमीन गाजीपुर में वामपंथ का झंडा खूब फहराया। बड़ा चर्चित किसान आंदोलन चलाने वाली स्वामी सहजानंद को इस धरती ने जन्म दिया और सियासत में सरजू पांडेय, विश्वनाथ शास्त्री जैसे लोग निकले, तो साहित्य में राही मासूम रजा जैसे कलमकार। राजनीति में अक्सर सुर्खियां बटोरने वाले आजमगढ़ की धरती पर समाजवादी व वामपंथी धारा ऐसी बही कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले मुलायम को भी भा गई। यह दुर्भाग्य ही है कि इस धरती को आतंकवाद से जोड़ा गया, जबकि राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कैफी आजमी जैसे साहित्यकारों और झारखंडे राय, जयप्रताप सिंह जैसे कामरेडों ने इस धरती को समृद्ध किया। इस धरती पर दबदबा बनाना भाजपा के लिए काफी मुश्किलों भरा रहा है। पर, अयोध्या आंदोलन के बाद कांग्रेसियों, समाजवादियों और वामपंथी चरित्र की इस धरती पर भी धीरे-धीरे भगवा रंग गाढ़ा होने लगा।
विकास पर विरासत का नया प्रयोग कसौटी पर
ऐसे में इस धरती का रण इसलिए भी दिलचस्पी बढ़ा रहा है, क्योंकि इस बार राष्ट्रवाद के शस्त्रों को नए तरीके से सान देकर विरासत और विकास के समीकरण से सनातन संस्कृति के सरोकारों को परवान चढ़ाने वाली यह जमीन प्रयोगशाला के रूप में इस बार कसौटी पर है। कारण, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी भी अयोध्या की तरह बीते पांच साल में मोदी व योगी सरकार के सनातन संस्कृति के सरोकारों के संदेशों को प्रसारित करने का केंद्र बनकर उभरा है। बीते वर्ष दिसंबर में काशी विश्वनाथ धाम के प्रथम चरण के लोकार्पण के साथ प्रधानमंत्री मोदी की गंगा डुबकी, विंध्यधाम कॉरिडोर के निर्माण पर चल रहे काम और सनातन संस्कृति एवं विरासत से जुड़े इस इलाके के अन्य स्थलों के सजाने-संवारने के काम ने इस धरती पर भी हिंदुत्व के वैचारिक अधिष्ठान के एजेंडे को प्रासंगिक बना दिया है। इसलिए अब जब चुनावी संग्राम का अंतिम चरण का निर्णायक लोकतांत्रिक युद्ध काशी और आसपास की धरती पर ही होने जा रहा है, तो विरासत के आधार पर हुए विकास के मॉडल को कसौटी पर कसा जाना तय माना जा रहा है।
इसलिए यह मैदान ज्यादा प्रासंगिक