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बेहद मुश्किल है, यहां अमित शाह का पास होना

Wed, 13 Aug 2014 03:36 AM IST
अखिलेश वाजपेयी / अमर उजाला ब्यूरो
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भले ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा हो कि आमचुनाव में देश ने अमित शाह की ताकत देखी, लेकिन असली जंग तो अब शुरू होगी। जब भाजपा भी सत्ता में है और सपा भी।
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सूबे में विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव में उम्मीदवारों से ज्यादा कड़ी परीक्षा नेताओं की होनी है। बसपा के चुनाव मैदान से हटने के ऐलान के साथ यह परीक्षा और कठिन हो गई है। खासतौर से सपा और भाजपा नेताओं की।

नतीजे इन पार्टियों के उम्मीदवारों की जीत हार तो तय करेंगे ही साथ ही इन नेताओं की नीति और रणनीति की जमीनी हकीकत का सच सामने भी लाएंगे। इसी के साथ देंगे इनके राजनीतिक भविष्य का संकेत।
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नतीजों से पता चलेगा कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी और नवनियुक्त प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल के रणकौशल के दावे कितने सच हैं वहीं औपचारिक तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कितना फर्क पैदा कर सकते हैं। यहां, एक विस्तृत रिपोर्टः

क्या सही साबित होगा मुलायम का दावा?

वहीं मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव के इस दावे की भी परख होगी कि लोकसभा चुनाव में लोग दुष्प्रचार में फंस गए, इसलिए सपा हार गई।

पर, विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं होगा। लोग दुष्प्रचार की सच्चाई आने के बाद फिर सपा के साथ खड़े होंगे।

वैसे तो कांग्रेस नेता भी दावा कर रहे हैं कि जनता ने उनको खारिज नहीं किया है। पर, दोनों पार्टियों के नेताओं के लिए यह उपचुनाव इसलिए भी परीक्षा बन गए हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव के विपरीत अब दोनों पार्टियों सत्ता में हैं।

मोदी के कामकाज का भी मूल्यांकन

भाजपा अभी-अभी केंद्र की सत्ता में आई है। भले ही दो महीने हुए हों लेकिन पार्टी के नेता इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि उत्तर प्रदेश में घटित होने वाली घटनाओं और लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों से उनका कोई लेनादेना नहीं है।

भले ही बहुत शोर न हुआ हो लेकिन जनता के बीच भी महंगाई के चलते मोदी सरकार के कामकाज को लेकर सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि केंद्र सरकार के कामकाज निकट भविष्य में होने वाले उपचुनाव की कसौटी पर नहीं कसे जाएंगे।

इसलिए भी है कठिन परीक्षा

स्वाभाविक रूप से उपचुनाव में भाजपा को महंगाई जैसे मुद्दे पर कुछ न कुछ सफाई जरूर देनी पड़ेगी। यही नहीं, लोकसभा चुनाव में जीत के बाद पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह (तब प्रदेश प्रभारी), प्रदेश अध्यक्ष डॉ. वाजपेयी और तब शाह के सहयोगी के रूप में सुनील बंसल की नीति, रणनीति और रणकौशल को इसका श्रेय दिया गया था।

अब शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए हैं। पर, उन्हें यह कुर्सी यूपी में सिकुड़ रहे कमल को खाद-पानी देकर खिलाने की एवज में ही दी गई है। इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद उपचुनाव के नतीजे उनकी इस छवि की सच्चाई बताने वाले होंगे।

पता चलेगा, कौन था असली फैक्टर

अमित शाह की तरह ही वाजपेयी व बंसल को यूपी में भाजपा का संकटमोचक माना जा रहा है। उपचुनाव नतीजों से पता चलेगा कि इसमें कितनी सच्चाई है।

लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने जीत दिलाई या शाह, वाजपेयी और बंसल की नीति, रणनीति और रणकौशल ने।

भाजपा अगर अपने कब्जे वाली सभी 11 सीटें लखनऊ पूरब, सिराथू, हमीरपुर, चरखारी, कैराना, बिजनौर, ठाकुरद्वारा, निघासन, बलहा, नोएडा व सहारनपुर जीत लेती है तो वास्तव में यह साबित हो जाएगा कि मोदी की लहर के साथ इन नेताओं के जमीनी काम, रणनीति और रणकौशल ने भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को 80 में 71 और गठबंधन सहित 73 सीटें दिलाईं।
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कानून-व्यवस्‍था पर घिर रही सरकार

जहां तक सपा की बात है तो लोकसभा चुनाव के बाद भी प्रदेश में कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर कोई बड़ा परिवर्तन करके नहीं दिखा सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता की चिंगारी न केवल लगातार सुलग रही है बल्कि नए इलाकों को अपनी चपेट में लेती जा रही है। कहीं भी कानून का असर नहीं दिख रहा है।

राजधानी लखनऊ तक में उपद्रव हो चुका है। एक व्यक्ति की जान भी जा चुकी है। हालांकि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा के अन्य नेता लगातार दावा कर रहे हैं कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त है।

सांप्रदायिक संघर्ष विपक्ष खासतौर से भाजपा की साजिश हैं। स्वाभाविक रूप से उपचुनाव में मिलने वाला वोट इन मुद्दों पर सपा मुखिया और मुख्यमंत्री के दावों की सच्चाई बताने वाला होगा।

सपा इनमें से कुछ सीटें भी जीत लेती है तो यह साबित हो जाएगा कि सपा नेताओं का दावा दुष्प्रचार के कारण हार की सफाई और कानून-व्यवस्था दुरुस्त होने का दावा सच है।
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