लखनऊ। मैं ना मानूंगी तोरी बरजोरी...,जाने दे मइका, सुनो सजनवा..., घिर-घिर आए बदरा...जैसी बंदिशों पर कभी तबले पर थाप देते तो कभी सुर साधते और कभी घुंघरुओं संग ताल मिलाते। कभी गुईन रोड स्थित ड्योढ़ी की छत पर चढ़कर कुछ खास मित्रों के साथ पेंच लड़ाना और पहुंचने से पहले रबड़ी की फरमाइश कर देना...। ऐसी ही तमाम स्मृतियों के साथ लखनऊ की सरजमीं ने कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज को श्रद्धांजलि दी। उनके जाने से आया सूनापन तो कभी नहीं भर पाएगा, लेकिन लखनऊ की ड्योढ़ी पर छोड़ी गई घुंघुरुओं की विरासत हमेशा गुलजार रहेगी।
लखनऊ घराने को अंतरराष्ट्रीय फलक पर नई बुलंदी देने के साथ, इससे युवाओं को जोड़ने के लिए कथक में नए प्रयोग और बालीवुड में अलग मुकाम दिलाने वाले पद्मविभूषण कथक सम्राट को खोकर पूरा कला जगत गमगीन है।
प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी महाराज जी को नमन करते हुए कहती हैं कि वह जहां-जहां गए, लखनऊ उनके साथ गया। नवंबर 2021 में वे लखनऊ आए, उनका सम्मान हुआ, सभी ने उनका आशीष लिया। माइक थामे मंच पर कुर्सी पर बैठे महाराज जी का चेहरा सृजन की आभा से दमक रहा था। अप्पा जी के साथ उनके भाव, निर्मल ठिठोली, गुरु केलुचरण महापात्रा जी के साथ अद्भुत जुगलबंदी, वीडियो कॉल पर अंतहीन बातें और एक भोली सी मुस्कान, चित्र ना जाने कितने हैं। उन्हें शब्द सीमा में बांधा नहीं जा सकता।
गुरु शिष्य परंपरा को उन्होंने सिर्फ घराने तक नहीं सीमित किया। पं. बिरजू महाराज को जानने वाले कहते हैं कि उनका प्रभाव जाने-अनजाने नृत्य-संगीत प्रेमियों पर मिलेगा। जानी-मानी नृत्यांगना कुमकुमधर कहती हैं कि बिना किसी दुविधा के यह कहा जा सकता है कि कथक जगत में पंडित बिरजू महाराज ही सर्वोच्च थे। मेरे गुरु पं. लच्छू महाराज के भतीजे थे, इस नाते वो जब भी सामना होता यही कहते कि ‘तुम्हारा हक है, गुरु भाई-बहन हैं हम।’ कथक का सौंदर्य, उसकी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए लखनऊ घराने को नई बुलंदी देने वाले पंडित जी तबला ही नहीं पखावज, नाल भी उतनी ही विशेषज्ञता से बजाते थे।
लोहे की आत्मकथा, फाइल कथा, लय परिक्रमा जैसी नृत्य नाटिकाएं उनके प्रयोग पसंद होने की अनूठी मिसाल हैं और लखनऊ घराने व कथक के लिए उनके द्वारा कराया गया विरासत का बीमा भी। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव तरुण राज कहते हैं कि महराज ने अपनी रचनाओं में पौराणिकता के साथ आधुनिकता का समावेश भी किया। एडिटिंग, प्रोडक्शन, लाइट एंड साउंड के सुंदर संयोजन के महारथी बिरजू महाराज सहज, सरल व सुलभ भी थे। चप्पल टूट जाने पर नंगे ही पैर अकादमी कार्यालय से ऑफिस तक चले जाना इसका एक उदाहरण है। कार्यशाला के दौरान पेटिंग बनाना और स्नेह स्वरूप मुझे उपहार दे देना या फिर प्रस्तुति देकर स्टेशन के लिए रवाना हो जाना और रास्ते में ही मेकअप उतारना, ड्रेस चेंज कर लेना बताता है कि वे अन्य सबसे परे सिर्फ कथक को समर्पित थे।
बब्बन की पतंग के दीवाने
गुइन रोड निवासी गोपीकृष्ण कहते हैं कि यहां बब्बन पतंगबाज हुआ करता था। दूर-दूर से लोग उसकी पतंग खरीदने आते थे। पंडित जी यहां आएं और दोस्तों के साथ पेंच न लड़े ये हो नहीं सकता था।
रबड़ी के दीवाने
2016 से कालिका बिंदा दीन ड्योढ़ी की देखरेख कर रहे रामजी मिश्रा कहते हैं कि जब से ये राज्य संग्रहालय के अधीन है, तब से हम यहां है। महराज जी को रबड़ी बहुत प्रिय थी। उनके यहां आने से पहले ही रबड़ी लाकर रख देने का आदेश मिल जाता था।
यही ख्वाहिश...इसी ड्योढ़ी पर दम निकले
रामजी मिश्रा कहते हैं कि महाराज जी इस ड्योढ़ी को और विस्तार देना चाहते थे। उनके आते ही ये ड्योढ़ी गुलजार हो जाती थी। नवंबर में आए तो इसे देखने आए थे। अंतिम इच्छा यही थी कि यहीं पर रहें और इसी ड्योढ़ी पर दम निकले।
हम सौभाग्यशाली
युवा नृत्यांगना एकता मिश्रा कहती हैं वे हमारे ताऊजी थे। हम छोटे हैं, क्या कह सकते हैं उनके बारे में। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारी आंखें उस आंगन में खुलीं, जहां उनके घुंघरुओं की खनक सुनाई देती है।
शांति देवी बोलीं, अब वो रौनक कहां
कालिका बिंदादीन ड्योढ़ी के बगल में बने मंदिर परिसर में रहने वालीं 90 वर्षीय शांति देवी नम आंखों से कहती हैं कि यहीं तो मेला लगता था, वे यहां आते थे, पर अब वो रौनक कहां।