चुनाव आ गए। भाजपा ने अलग राज्य पर अपनी प्रतिबद्धता जताई। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिन ही रही। वह इसपर कुछ कर तो नहीं सके, लेकिन वादा जरूर किया कि जब उनकी स्थायी सरकार बनेगी तो इसपर जरूर काम करेंगे। इसके बाद संयुक्त मोर्चा ने जनता दल के नेता और कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने।
उन्होंने 15 अगस्त 1996 को लाल किला से यूपी के पर्वतीय जिलों को मिलाकर अलग राज्य की स्थापना की घोषणा की। पर, 21 अप्रैल 1997 को उन्हें पद से हटना पड़ा। वर्ष 1998 में लोकसभा के फिर चुनाव हुए।
अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार ने उत्तरांचल विधेयक राष्ट्रपति के माध्यम से प्रदेश विधानसभा को भेजा। प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने 26 संशोधनों के साथ ‘उत्तरांचल राज्य विधेयक’ विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजा। पर, इसी बीच 1999 में लोकसभा के फिर चुनाव हो गए।
केंद्र सरकार ने पारित किया विधेयक
अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2000’ लोकसभा में रखा। लोकसभा ने 1 अगस्त और राज्यसभा ने 10 अगस्त को इस विधेयक को पारित कर दिया। राष्ट्रपति ने अगस्त 2000 में विधेयक को स्वीकृति दे दी। विधेयक अधिनियम बन गया। प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने अन्य औपचारिकताएं पूरी कर 9 नवंबर 2000 को प्रदेश का औपचारिक विभाजन कर दिया। इस तरह उत्तरांचल राज्य अस्तित्व में आया।
उत्तरांचल के लोग अपना राज्य बनने से खुश तो थे लेकिन उनकी मांग थी कि राज्य का नाम उत्तरांचल के बजाय उत्तराखंड रखा जाए। आखिरकार लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए केंद्र सरकार ने 21 दिसंबर, 2006 को उत्तरांचल (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2006 को पारित कर दिया। केंद्र सरकार ने 29 दिसंबर 2006 को 1 जनवरी, 2007 से उत्तरांचल का नाम उत्तराखंड करने की अधिसूचना जारी कर दी। राज्य के गठन के समय प्रदेश विधानसभा में पर्वतीय क्षेत्रों से 22 और विधानपरिषद में 8 सदस्य थे। नए राज्य में 71 सदस्यीय विधानसभा बनाने का निर्णय हुआ। इसमें 70 निर्वाचित होते हैं, जबकि एंग्लो इंडियन समुदाय से एक सदस्य मनोनीत किया जाता है।
यूपी के और बंटवारे की मांग ने जोर पकड़ा
उत्तराखंड के अलावा देश में मध्यप्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ़ और बिहार को काटकर झारखंड राज्य बनाने के कारण भाजपा छोटे राज्यों के समर्थक के रूप में उभरी। साथ ही इन राज्यों के निर्माण ने उत्तर प्रदेश के और बंटवारे की मांग करने वालों का हौसला बढ़ा दिया। पश्चिम से हरित प्रदेश की मांग उठी तो पूरब से अलग पूर्वांचल राज्य बनाने की आवाज मुखर हुई। बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने को लेकर आंदोलन हुए। तराई से रुहेलखंड राज्य बनाने की मांग भी उठी। ये मांगें अब भी अलग-अलग तरीके से जब-तब सामने आती रहती हैं। कुछ राजनीतिक दल भी समय-समय पर राज्य के बंटवारे पर अपने समीकरणों के लिहाज से राजनीति करते हैं। बसपा की नेता मायावती का प्रदेश को 4 हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव भी सभी को याद होगा।