विधानसभा तो निलंबित हो गई, लेकिन परदे के पीछे सरकार बनाने की कवायदें जारी रहीं। सरकार बनाने के सबसे नजदीक थी भाजपा, बशर्ते उसे बसपा का साथ मिल जाता। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी और कांशीराम के बीच बातचीत शुरू हुई।
बसपा मायावती को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़ गई। कोई और रास्ता न देख भाजपा ने हामी भर दी, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। छह-छह महीने के मुख्यमंत्री का नायाब फॉर्मूला निकाला गया।
बसपा फिर अड़ गई कि पहले छह महीने के लिए मायावती को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए। भाजपा राजी तो हो गई लेकिन इस शर्त के साथ कि विधानसभा अध्यक्ष उसका होगा। दोनों में गठबंधन हुआ और 21 मार्च 1997 को पहले छह महीने के लिए मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। पहले चार महीने तो ठीक-ठाक बीते, लेकिन उसके बाद मायावती के कई फैसलों ने भाजपा व बसपा के बीच कड़वाहट बढ़ाना शुरू कर दिया।
मायावती ने पलटी मारी
मायावती ने समझौते के अनुसार 21 सितंबर 1997 को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला। दोनों पार्टियों में तल्खी और तकरार लगातार तेज हो रही थी। कल्याण एक के बाद एक, मायावती के फैसले पलटने लगे। तिलमिलाई बसपा ने 19 अक्तूबर को समर्थन वापस ले लिया। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण को दो दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश दे दिया।
सदन में चले लात-घूंसे
बसपा, कांग्रेस और जनता दल (यू) के विधायक टूटने लगे। 21 अक्तूबर 1997 को बहुमत परीक्षण के दौरान विधायकों ने सदन की मर्यादा ताक पर रखते हुए एक-दूसरे पर माइक व जूते-चप्पल फेंके। लात-घूंसे चले। कल्याण को 222 विधायकों का समर्थन मिला।
विधानसभा में हुई हिंसा के बाद राज्यपाल भंडारी ने 22 अक्तूबर 1997 को राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। पर, राष्ट्रपति केआर नारायणन ने इसे मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने दोबारा विचार के लिए उसे केंद्र सरकार के पास भेजा। आखिरकार केंद्र सरकार ने भी सिफारिश को दोबारा राष्ट्रपति के पास नहीं भेजने का फैसला किया और इस तरह कल्याण सिंह सरकार चलती रही।
जंबो मंत्रिमंडल का भी रिकॉर्ड
कल्याण सिंह को दूसरे दलों से आए ज्यादातर विधायकों को मंत्री बनाना पड़ा। उन्होंने मंत्रिमंडल में 93 लोगों को शामिल किया। इतना बड़ा मंत्रिमंडल प्रदेश में पहले कभी नहीं बना था। इसके बाद देश में मंत्रियों की संख्या को लेकर बहस छिड़ी और नियम बना कि दोनों सदनों की संख्या का अधिकतम 15 प्रतिशत ही मंत्रिमंडल का आकार होगा।
आपराधिक छवि वाले दोस्त बने
कल्याण ने सरकार तो बचा ली लेकिन उन्हें बहुत कुछ गंवाना पड़ा। राजा भैया के खिलाफ ‘कुंडा को गुंडा विहीन करूं, प्रण करत ध्वज उठाय दोउ हाथ’ का शंखनाद करने वाले कल्याण को राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ी, क्योंकि मायावती के समर्थन वापस लेने के बाद उन्होंने ही उनकी मदद की थी।
कल्याण सिंह की सरकार बचाने आए जगदंबिका पाल का मन भी कुछ दिनों में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए मचलने लगा। राज्यपाल रोमेश भंडारी भी कल्याण सरकार को नहीं देखना चाहते थे। बसपा विधायकों को तोड़ने से मायावती तो पहले से ही नाराज चल रही थीं। पाल ने मायावती से बातचीत की और कथानक तैयार हो गया। 21 फरवरी, 1998 को भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को रात 10.30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। वरिष्ठ पत्रकार योगेश श्रीवास्तव बताते हैं कि पाला बदल के खेल में माहिर नरेश अग्रवाल भी पाल के साथ थे। वह उप मुख्यमंत्री बन गए। अटल बिहारी वाजपेयी को राज्यपाल के फैसले के खिलाफ धरना और आमरण अनशन पर बैठना पड़ा।
जब सचिवालय में दो मुख्यमंत्री बैठे थे
कल्याण सरकार की बर्खास्तगी पर भाजपा नेताओं ने रात में ही उच्च न्यायालय की शरण ली। न्यायालय ने राज्यपाल के फैसले पर रोक लगा दी और कल्याण सरकार को बहाल कर दिया। उस दिन सचिवालय में अजीब नजारा देखने को मिला। वहां दो मुख्यमंत्री बैठे थे। जगदंबिका पाल सुबह-सुबह ही सचिवालय पहुंच कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए तो कल्याण सिंह बगल वाले कमरे में बैठकर कुर्सी खाली होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अधिकारियों ने जब उच्च न्यायालय का आदेश दिखाते हुए कड़े तेवर दिखाए तो पाल भारी मन से कुर्सी छोड़कर चले गए। विवाद बढ़ने पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 26 फरवरी को फिर बहुमत का परीक्षण हुआ, जिसमें कल्याण सिंह जीते। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर पाल की मुख्यमंत्री की शपथ और कार्यकाल को शून्य माना गया। मुख्यमंत्रियों की सूची से पाल का नाम भी हटा दिया गया।
राज्यपाल की विधानसभा अध्यक्ष से भी ठनी
पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने को लेकर राज्यपाल भंडारी की भी खूब किरकिरी हुई। बहुमत साबित करने के दौरान राज्यपाल भंडारी और विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी के बीच खूब तल्खी हुई। राज्यपाल पर्यवेक्षकों की देखरेख में बहुमत परीक्षण चाहते थे, लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष त्रिपाठी ने अपने अधिकारों का हवाला देते हुए उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।
सत्ता बदली, पर सांसत खत्म नहीं हुई
कल्याण को हटाने और रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाने के बावजूद भाजपा की अंदरूनी खींचतान खत्म नहीं हुई। कुछ दिन की शांति के बाद रामप्रकाश गुप्त को लेकर तरह-तरह की खबरें आने लगीं। खासतौर से उनके भुलक्कड़ होने की बात काफी तेजी से फैली। इस सबके बीच वर्ष 2000 की दिवाली भी प्रदेश में सत्ता बदल का संदेश लेकर आई। गुप्त की जगह राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला।