बजट में हर परिवार के एक सदस्य को रोजगार या नौकरी, निराश्रित महिलाओं, बुजुर्गों एवं दिव्यांगों की पेंशन में बढ़ोतरी के लिए धन का प्रावधान, चुनाव में किए गए वायदे के अनुसार उज्ज्वला रसोई गैस लाभार्थियों को वर्ष में दो बार मुफ्त सिलेंडर देने के लिए धन की व्यवस्था, बुंदेलखंड को अगले पांच सालों में पूरी तरह प्राकृतिक कृषि से जोड़ने का संकल्प, किसानों के लिए भामाशाह कोष स्थापित करना 2024 के मिशन को मजबूत करने का ही हिस्सा है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा के विजय अभियान को लगातार आगे बढ़ाने में सरकार की गरीब कल्याण योजनाओं की काफी भूमिका रही है। शायद इसीलिए योगी सरकार ने लाभ से वंचित गरीबों को भी सूची में शामिल कर उन्हें भी इनका लाभ दिलाने की व्यवस्था की है ताकि गरीबों का जुड़ाव भी ज्यादा मजबूत रहे।
ये भी है वजह: अर्थशास्त्रियों की भाषा में कहा जाए तो योगी सरकार ने इस बजट के जरिये प्रदेश के आधारभूत ढांचे को मजबूत बनाने के साथ भाजपा का आधार भी और मजबूत बनाने की कोशिश की है। अर्थशास्त्री प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि यह बजट पीबीसी अर्थात पॉलिटिकल बजट साइकिल का उदाहरण है जिसे राजनीतिक बजट चक्र कहते हैं। जो अमूमन विश्व के प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में दिखता है। यह बात दीगर है कि योगी जी ने अपने दूसरे कार्यकाल के इस पहले ही बजट से शुरू कर दिया।
आमतौर पर यह काम चुनाव के पूर्व वाले साल के बजट में होता है। प्रो. तिवारी की बात सही लगती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बजट पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा भी कि इस बजट के जरिये उन्होंने पांच साल की कार्ययोजना एवं सरकार की विकास दृष्टि को प्रस्तुत करने की कोशिश की है ।
मुसीबतें हैं महंगाई और यूक्रेन युद्ध, कर्ज लिया तो बढ़ेगा घाटा
हालांकि यह सब सरकार के बेहतर राजस्व वसूली के अनुमानों पर टिका हुआ हैं । कारण, देश व दुनिया की जो मौजूदा आर्थिक स्थिति है उसके देखते हुए यह आशंका होती है कि राजस्व प्राप्ति के अनुमान फिसल न जाएं । विश्व के अन्य देशों में यूक्रेन संकट के चलते मंहगाई सिर उठाए हुए है। विकास की गति भी सुस्त है। इसके असर से भारत भी अछूता नहीं रह गया है ।
ऐसे में अगर महंगाई और सुस्त विकास का यूपी में भी असर दिखा तो बड़ी चुनौती होगी। अगर खर्च का दबाव बढ़ता रहा और आमदनी घटी तो सरकार को कर्ज लेना पड़ेगा जिससे घाटा और बढ़ेगा। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कर्ज लेना पड़ा तो बजट प्रस्तावों ज्यों का त्यों जमीन पर उतारना मुश्किल होगा ।