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अयोध्या विवादः सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर क्या कहते हैं दोनों पक्ष, देखें

Wed, 22 Mar 2017 02:30 PM IST
amarujala.com, presented by काजल शर्मा
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डेमो - फोटो : डेमो फोटो
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रामजन्मूमि/बाबरी मस्जिद मामले में पक्षकारों के बीच वार्ता कर सुलह-समझौता की कोशिश करने के सुझाव का यहां सभी पक्षकारों ने स्वागत किया है। हालांकि उनकी शर्त है कि वार्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या उनकी ओर से गठित जजों की वेंच के संरक्षण में ही हो।
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हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए पक्ष ही बातचीत के लिए बुलाए जाएं। पहले की तरह राजनीतिक, धार्मिक या अन्य पक्ष वार्ता में कत्तई शामिल न हों। 

वर्ष 1528 से शुरू हुए मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर 30 सितंबर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन हिस्सों में राम मंदिर के निर्माण के लिए हिंदू महासभा द्वारा प्रतिनिधित्व रामलला या शिशु राम, इस्लामिक सुन्नी वक्फ  बोर्ड, व एक हिंदू धार्मिक संप्रदाय निर्मोही अखाड़ा के बीच बांटा था।
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इसके खिलाफ पहले वक्फ बोर्ड, फिर सखा रामलला और निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट चले गए। मंगलवार को चीफ ज‌स्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं। इस मुद्दे पर धीरेंद्र स‌िंह ने जाना पक्षकारों का रवैया...

हमें इंसाफ चाहिए, वार्ता को तैयार है

हाजी महबूब - फोटो : amar ujala
सुप्रीम कोर्ट के वार्ता के सुझाव का हम स्वागत करते हैं। हमें इंसाफ चाहिए। अयोध्या के  हिन्दू-मुसलमान कभी विवाद नहीं चाहते हैं। अगर अदालत खुद फैसला कर सकती है तो वह क्यों नहीं करती? हम मुकदमा नहीं वापस लेंगे।

हमारी मस्जिद की जगह छोड़ दें। हम मस्जिद भी नहीं बनाना चाहते हैं, मगर मंदिर जिसको बनाना है, वह चबूतरा पर बनवाए। पहले से मस्जिद की जगह रामलला विराजमान होते तो हम कुछ नहीं कहते।
  प्रापर्टी के विवाद में सखा रामलला पक्ष कहां आते हैं। बातचीत में पर्सनल ला बोर्ड के ओलमा, हम सब मुद्दई-पक्षकार ही रहेगें। तोगड़िया जैसे लोग बैठेंगे तो बात कैसे होगी? महंत ज्ञानदास मामले में कुछ नहीं है, उनसे क्या लेना देना है। - हाजी महबूब, सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार

हम लोग तो यह चाहते हैं कि आपसी समझौते से मामला हल हो जाए। हम बैठक कर अपने लोगों से राय लेंगे और साधु-संत भी इसके लिए आगे आयें। मुकदमे के दोनों पक्षकार साथ बैठकर बात करें, जिससे विवाद का हल हो सके।  

महंत ज्ञानदास और मेरे पिता आपस में समझौते के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे, लेकिन विहिप के अड़ंगे के चलते मामला हल नहीं हो सका। - इकबाल अंसारी, केस में पक्षकार( हाशिम अंसारी के बेटे)
 

अच्छा सुझाव पर, पक्षकारों में ही हो बात

पुजारी रामदास - फोटो : amar ujala
बातचीत के लिए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पैनल बनें। इसमें राजनैतिक हस्तक्षेप न हो और किसी  बाहरी व्यक्ति का प्रवेश न हो। निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान के बीच ही बात हो।

प्रेम भाव से मुस्लिम पक्ष को अपना दावा छोड़ देना चाहिए। अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था ना कि बाबर का और उस स्थान पर कभी भी किसी मुस्लिम ने नमाज नहीं पढ़ी।

मुस्लिम समाज के लोग उस स्थान से अपना दावा वापस ले लें और अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो सके । -पुजारी रामदास, पक्षकार निर्मोही अखाड़े के उत्तराधिकारी 

बेहतर होगा कि समझौते के लिए स्वयं सुप्रीम कोर्ट सभी पक्षों को आमंत्रित करें। वार्ता में पक्षकार ही बुलाए जाएं। उनके वकील या प्रतिनिधि भाग ले सकते हैं। बाहरी कोई भी वार्ता में शामिल न हो।

समझौते का प्रयास कई बार हो चुका है। सबसे अच्छा प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने किया था। हर बार मुस्लिम पक्ष के लोग पीछे हट जाते हैं। तब सैयद शहाबुद्दीन कहते थे कि साबित हो जाए कि मंदिर तोड़कर मस्दिज बनीं थी तो मंदिर निर्माण के लिए खुद फावड़ा चलाएंगे।

हाईकोर्ट के फैसले में गर्भगृह हमें सौंपा जा चुका है। आर्डर को मुसलमान मानता है तो हम वार्ता के लिए तैयार हैं। - त्रिलोकी नाथ पांडेय, सखा रामलला की ओर से पक्षकार
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अब हल हो जाएगा मंदिर-मस्जिद विवाद

स्वामी हरदयाल शास्त्री - फोटो : amar ujala
सुप्रीम कोर्ट शुरू से ही सीपीसी की धारा 89 के तहत सुलह-समझौते के पक्ष में है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू-मुस्लिम पक्षकारों के अलावा कमिश्नर फैजाबाद और दो आब्जर्वर को निर्धारित किया है, जो हर दूसरे रविवार को उस विवादित स्थान की देख रेख के लिए जाते हैं।

इसका उद्देश्य यही है कि दोनों पक्ष के लोग एक साथ मिलें-बैठे और कुछ सकारात्मक बातचीत हो। ज्योतिषीय गणना भी यह कह रही है कि आने वाले समय में इस विवाद का हल हो जाएगा। हम खुले दिल से सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का स्वागत करते हैं। - स्वामी हरदयाल शास्त्री, पक्षकार अन‌ि अखाड़ा के महंत धर्मदास के प्रतिनिधि

 सुप्रीम कोर्ट का सुझाव गंगा-जमुनी तहजीब के लिए स्वागत योग्य है। हमने मामले के मुद्दई मरहूम हाशिम अंसारी के साथ मिलकर सुलह-समझौते की कई बार कोशिशें की, लेकिन विश्व हिंदू परिषद के लोग अड़ंगा लगाते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद कोर्ट की निगरानी में मामले पर वार्ता होनी चाहिए, ताकि अयोध्या का विकास हो। - ज्ञानदास, हनुमान गढ़ी के महंत
 
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