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यूपी चुनाव में गन्ने का भुगतान बड़ा मुद्दा: किसान बोले- समय से भुगतान न होना एक बड़ी समस्या

Mon, 27 Dec 2021 11:43 AM IST
ishwar ashish अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ

सार

गन्ने की खेती से करीब चार करोड़ लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है। किसानों का कहना है कि समय से भुगतान नहीं होता है। भाजपा सरकार का दावा है कि गन्ना किसानों को चार वर्षों में लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे
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विस्तार
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पक्की खेती के नाम से मशहूर गन्ना इस चुनाव में अहम मुद्दा है। प्रदेश के लगभग चालीस-पचास लाख किसान गन्ना पैदा करते हैं। अगर परिवार के तौर पर देखें तो चार करोड़ लोगों की रोजी इससे जुड़ी हुई है। गन्ना किसानों का सबसे बड़ा मुद्दा है बकाया का समय से भुगतान नहीं होना। अब भी किसानों का पिछले सत्र का लगभग दो हजार करोड़ रुपये बकाया हैं। जबकि सभी मिलें चल रही हैं। प्रदेश में 120 चीनी मिलें हैं। मिलों का गणित साफ है। पहले गन्ना पहुंचाओ, बाद में दाम पाओ। गन्ना मूल्य को लेकर किसान नाराजगी जाहिर करते रहे हैं।

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किसानों के मुताबिक, उर्वरकों, कीटनाशकों से लेकर डीजल आदि के दाम जिस हिसाब से बढ़े, उस हिसाब से सरकार गन्ना मूल्य नहीं बढ़ा रही है। हालांकि, सरकार ने इस साल गन्ने का दाम 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया है। किसान हुकुम सिंह कहते हैं,  समय से भुगतान न होना एक बड़ी समस्या बन गई है। पंजाब व दूसरे राज्यों में दाम ज्यादा हैं तो यूपी में कम क्यों?

14 दिन के अंदर भुगतान को लेकर जंग, चुनावी लाभ की मंशा
गन्ना तौल के 14 दिन के भीतर भुगतान नहीं होने का मामला रालोद-सपा गठबंधन जोर-शोर से उठा रहा है। जाहिर है, इस मसले को उठाकर वे चुनावी लाभ लेने कीकोशिश में हैं। वहीं भाजपा बार-बार यह बता रही है कि गन्ना किसानों को चार वर्षों में लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया।

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गन्ने का भुगतान और एमएसपी बड़े मुद्दे

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक वीएम सिंह का कहना है कि यूपी में लगभग चार करोड़ लोग गन्ने से जुड़े हैं। उनकी समस्याओं का समाधान कहां हुआ। 14 दिन में गन्ना बकाया पर ब्याज देने की लड़ाई हमने कोर्ट से जीती, लेकिन 14 दिन भी हमारा भुगतान क्यों लटके? भुगतान तत्काल होना ही चाहिए। अब आदेश होने के बाद भी बहाने तलाशे जा रहे हैं कि इसे कैसे लटकाया जाए। सरकार चुनाव की अधिसूचना जारी होने का इंतजार कर रही है और उसके बाद अदालत में यह बहाना पेश करेगी कि अब तो आचार संहिता लग गई, इसका कैसे निदान करें। यह बात किसान भी समझते हैं। गन्ना इसलिए भी बड़ा मुद्दा है क्योंकि 9 अप्रैल 2019 से कैबिनेट के पास बकाया पर ब्याज का प्रस्ताव लंबित है, जबकि कैबिनेट अन्य तमाम प्रस्ताव पर मंजूरी देती रही। किसान इस बात को समझते हैं। उन्हें बरगलाया नहीं जा सकता है। इसके अलावा एमएसपी बड़ा मुद्दा है। भले ही कृषि कानून वापस हो गया हो, लेकिन एमएसपी पर फसल का मूल्य मिलना बेहद जरूरी है। आज यह मांग पूरे देश भर से उठ रही है। जब तक गन्ना औरएमएसपी जैसे मामलों का हल नहीं निकलेगा, किसानों के लिए बड़े मुद्दे खड़े रहेंगे।
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बड़ा सवाल : बहुसंख्यक किसान चुनावी बिसात पर कहां खड़े हैं

समाजशास्त्री डॉ. प्रेम प्रकाश पांडेय कहते हैं, किसानों का मुद्दा सरगर्म है। तीन कृषि कानून वापस लिए जाने से भाजपा काफी राहत महसूस कर सकती है। पर किसान वैचारिक धरातल पर दो पंक्तियों में नजर आ रहा है। इसलिए, चुनाव में बहुसंख्यक किसानों का रुख क्या होगा, यह अहम है। गोंडा के किसान पीजी कॉलेज बभनान में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पांडेय बताते हैं कि किसानों के एक तबके की उलाहना है कि सरकारें हर काम सियासत को ध्यान में रखकर करती हैं। किसान महंगाई से चार साल जूझते रहे, लेकिन गन्ना मूल्य चुनावी साल में बढ़ा। कृषि कानूनों को लेकर एक वर्ष तक चुप्पी साधे रखी गई। पर, दूसरी पंक्ति के किसानों का तर्क है, चाहे किसान सम्मान निधि हो या फसल का मुआवजा बढ़ाने का काम, पीएम नरेंद्र मोदी ने ही किया। ऐसे लोग यह तक कहते हैं कि भाजपा जनता से डरने वाली सरकार है। चूक का अंदाजा होने पर स्वीकार कर सुधार लेती है।  फिलहाल, किसानों के एक तबके का कहना है कि मोदी ने कानून वापस लेकर अच्छा किया। मोदी का माफी मांगना बहुत बड़ी बात है। मोदी ही ऐसा कर सकते थे। 
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