केंद्र सरकार ने किसानों की आय दोगुना करने के संबंध में रणनीति तैयार करने के लिए 2016 में 1984 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक दलवाई की अध्यक्षता में एक समिति ‘डबलिंग फॉर्मर्स इनकम कमेटी’ गठित की थी। समिति 2018 में 2015-16 की थोक कीमतों के आधार पर 2022 तक किसानों की सालाना आय दोगुना करने के सुझाव के साथ अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है। यूपी से राज्यसभा सांसद विजयपाल सिंह तोमर भी इस समिति के सदस्य थे। आगामी चुनावों में किसानों से जुड़े मुद्दे चर्चा के विषय हैं। ‘अमर उजाला’ ने तोमर से किसानों के मुद्दों पर बात की। बातचीत के प्रमुख अंश...
सवाल : मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुना करने का एलान किया था। क्या प्रगति है?
जवाब : वर्ष 1750 तक देश के 80 फीसदी लोग कृषि से जुड़े हुए थे और विश्व की अर्थव्यवस्था में 25 फीसदी योगदान था। उस समय विश्व के सबसे संपन्न राष्ट्र थे और देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। पहली पंचवर्षीय योजना के अलावा कभी भी कृषि या गांव को बजट में पर्याप्त हिस्सा नहीं मिला। आजादी के समय प्रदेश के 82 फीसदी लोग गांव में रहते थे और 75 फीसदी खेती से जुड़े थे। उस समय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 51.8 फीसदी था। कांग्रेस के कार्यकाल में 20 प्रतिशत किसानों ने खेती छोड़ी। हालात ये थे कि 2005 से 2012 के बीच 3.70 करोड़ किसानों ने खेती छोड़ दी। सवाल यह है कि ये लोग खेती छोड़कर क्यों भागे, जबकि कृषि सेक्टर ही सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी ताकत को पहचाना और किसानों की आय दोगुनी करने और देश की अर्थव्यवस्था को 50 खरब डॉलर तक ले जाने की योजना पर काम शुरू किया। दुनिया की 18 फीसदी आबादी व 11 फीसदी पशु भारत में हैं। इतनी आबादी और पशुओं का भरण पोषण भी करना है। इसके लिए चारा और राशन चाहिए जिसके लिए जमीन और पानी की जरूरत है। हमारे पास विश्व की सतही भूमि ढाई फीसदी से कम और पानी 4.5 फीसदी से कम है। कम पानी और कम जमीन में हम कैसे ज्यादा आमदनी कर सकते हैं, सरकार ने इसकी व्यापक रणनीति बनाई। कांग्रेस ने 2009-14 के कार्यकाल में जितना बजट किसानों के लिए दिया था मोदी सरकार ने उससे ज्यादा इस वर्ष के बजट में दिया है। इस वर्ष का कृषि बजट 1.23 लाखकरोड़ से ज्यादा है। आज उसका नतीजा सामने है।
सवाल : किसानों की दोगुनी आय को लेकर कितनी प्रगति हुई?
जवाब : 2014 में जब हमारी बैठक शुरू हुई, उस समय लघु-सीमांत किसान की फसल उत्पादन से औसत आमदनी 527 रुपये महीना (6324 रुपये वार्षिक) थी। डेयरी, पशुपालन या परिवार के बच्चों की कमाई इसमें शामिल नहीं थी। कुछ दिन पहले आई सर्वे रिपोर्ट बताती है कि लघु सीमांत किसान की औसत आमदनी अब बढ़कर 839 रुपये महीने (10,068 रुपये वार्षिक) हो गई है। इसके अलावा 500 रुपये प्रतिमाह किसान सम्मान निधि से दी जा रही है। इस तरह किसान की आय में दो गुना से अधिक वृद्धि हुई है और लगातार इसमें वृद्धि के प्रयास जारी हैं।
सवाल : केंद्र सरकार लगातार कह रही थी कि तीन कृषि कानून 80 प्रतिशत लघु व सीमांत किसानों के हित में थे। अचानक इसे वापस क्यों लिया गया?
जवाब : कृषि सुधार को लेकर जो भी आयोग बने, सभी को पढ़ा गया था। इसमें मोंटेक सिंह आहलूवालिया, एमएस स्वामीनाथन व कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित सभी कमेटियों की सिफारिशें शामिल थीं। किसानों की स्थिति में सुधार के लिए प्रोसेसिंग, भंडारण, मार्केटिंग, कृषि यंत्रों व उर्वरक की उपलब्धता तथा सब्सिडी आदि पर चर्चा तथा स्टैंडिंग कमेटी ऑन एग्रीकल्चर की संस्तुति के आधार पर तीन कृषि सुधार कानून बनाने की सिफारिश की गई थी। सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की 80 फीसदी सिफारिशें मान ली थीं। प्रधानमंत्री की सोच थी कि किसानों पर जो प्रतिबंध लग रहे हैं, हट जाए। वे जहां चाहें, जब चाहें, जिसे चाहें अपनी फसल बेचें। कई स्तर से किसानों को बाजार का विकल्प देने का सुझाव आया था। कृषि सुधार कानूनों में इसे शामिल किया गया। मंडी के बाहर बेचने का विकल्प दिया। रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया। तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए हम किसी के झांसे में नहीं आए। किसान हित में कानून बनाया गया था और देश हित में वापस लिया गया। मैं समझता हूं कि देश के सीमावर्ती राज्य पंजाब के हालत को देखते हुए वापस लेना पड़ा।
सवाल : आप किसानों को दो हिस्से में बांट रहे हैं। इसका मतलब क्या है?
जवाब : देश में 86 फीसदी लघु सीमांत किसान हैं। उनकी आमदनी बढ़ानी है। जो 14 फीसदी हैं, वह खुद खेती नहीं करते। इनके पास जमीन बहुत ज्यादा है, खेती करा रहे हैं। प्रधानमंत्री इन 86 फीसदी छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए कानून लाए थे। लेकिन, विरोधी पार्टियां जिद करके तथाकथित आंदोलनकारियों के साथ और किसान कानून के खिलाफ खड़ी हुईं। ये मोदी विरोधी नहीं, वास्तव में किसान विरोधी व देश विरोधी हैं। इन कथित आंदोलकारियों की तादात 20 प्रतिशत से अधिक नहीं है। 80 प्रतिशत तो आंदोलन के समय भी खेत में काम कर रहे थे। आंदोलन के दौरान ही 10 वर्षों में सबसे ज्यादा गेंहू और धान की पैदावार हुई है। यह रिकॉर्ड पैदावार करने वाले छोटे किसान ही थे। आंदोलन करने वाले खेत में काम नहीं करते। ये कहते थे कि एमएसपी खत्म कर देंगे, लेकिन इसी दौरान सबसे ज्यादा एमएसपी पर खरीद हुई। एमएसपी का डेढ़ गुना इसी सरकार ने देना शुरू किया। छोटे किसानों का देश के लिए यही समर्पण उन्हें 14 फीसदी से अलग करता है और सरकार को उनके लिए लगातार प्रयास करने को प्रेरित करता है। मोदी सरकार का संकल्प है कि तीन कृषि कानून वापस होने के बावजूद कृषि सेक्टर में सुधार और छोटे व मझोले किसानों के हित की कोशिश जारी रहेगी।
सवाल : कृषि कानूनों की वापसी के बाद छोटे किसानों की मदद कैसे होगी?
जवाब : ब्राजील, यूएसस, फिलीपींस में वैल्यू एडिशन 70 फीसदी तक है। भारत में 6.7 प्रतिशत के बीच है। किसान गेहूं पैदा करते हैं तो यह 20 रुपये किलो बिकता है। उसी का आटा बन गया तो 40 में और दलिया बना दी तो 55.60 रुपये में बिकने लगा। प्रतापगढ़ का आंवला 10 रुपये किग्रा जाता है, उसी की कैंडी 250 रुपये किग्रा बिकती है। रिसर्च बताते हैं कि किसान को अपने उत्पाद का बमुश्किल 30 फीसदी मिल पाता है बाकी 70 फीसदी बिचौलिए के पास चला जाता है। सरकार इस स्थिति को बदलने के लिए रणनीति पर काम कर रही है। पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ आमदनी भी बढ़ाने का प्रयास शुरू किया गया है। इसके लिए लागत घटाने व पैदावार की वैल्यू एडिशन बढ़ाने की कोशिश शुरू की गई, जिससे आमदनी बढ़ने की राह खुली है।
सवाल : किसान लागत बढ़ने की बात करते हैं और आप आय बढ़ने की। बात समझ में नहीं आ रही।
जवाब : आय बढ़ाने की बात हम नहीं, प्रामाणिक रिपोर्ट कह रही है। एक यूपीए सरकार के राज में आई थी, दूसरी मोदी सरकार के कार्यकाल में। इसे समझने के लिए किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार उठाए गए कदमों को देखना पड़ेगा।
पहला सरकार ने आते ही नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत की। इससे खाद की ब्लैक मार्केटिंग खत्म हुई। यूरिया का दुरुपयोग और नकली खाद का धंधा बंद हुआ। पहले जितने खेत में 50 किग्रा यूरिया का असर दिखता था, उतने के लिए नीम
कोटेड 45 किग्रा यूरिया ही पर्याप्त पाई गई। दूसरा, स्वायल हेल्थ कार्ड की सुविधा दी गई, जिससे किसान को पता चलने लगा कि उसे खाद की कितनी मात्रा की जरूरत है। पैदावार भी कुछ बढ़ी। तीसरा, किसानों को कृषि के विविधीकरण व
वैल्यू एडिशन के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उन्हें बता रहे हैं कि केवल गेहूं और धान बोने से काम चलने वाला नहीं है। इनके बाय प्रोडक्ट तैयार करने शुरू कीजिए। इसके लिए सहायता दे रहे हैं। चौथा, बड़े पैमाने पर ड्रिप व स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई को प्रोत्साहन दिया। इसके लिए बजट बढ़ाया गया। सीधे जड़ में पानी पड़ने से पानी कम देना पड़ता है। बिजली, मजदूरी और खाद की बचत होती है। इस तरह की सिंचाई से 25 प्रतिशत तक पैदावार बढ़ जाती है। पांचवां, किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाई गई तथा पशुपालन व मत्स्य पालन करने वालों को भी देना शुरू किया गया। छठा, मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने की पहल हुई है। मधुमक्खी पालन डाल पर होता है, जमीन का उपयोग नहीं होता। विशेषज्ञ बताते हैं कि जिन खेतों की डालों पर मधुमक्खी का पालन करते हैं, उनमें 6-10 फीसदी तक पैदावार ज्यादा होती है। सातवां, जैविक खाद के लिए विशेष जोर दिया जा रहा है। आय में वृद्धि समग्र प्रयासों का असर है। आज स्थिति यह है कि गन्ना किसान पहले जितनी जमीन व लागत में 60 क्विंटल गन्ना का उत्पादन करता था, आज उतनी ही जमीन व उतनी ही लागत में वह 80-90 क्विंटल गन्ना का उत्पादन कर रहा है। प्रति क्विंटल लागत घटी है और आय बढ़ी है।